संघ प्रमुख मोहन भागवत का दो दिवसीय दौरा सिलीगुड़ी में

 

अजित प्रसाद, विशेष संवाददाता / सिलीगुड़ी: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत संघ प्रमुख दो दिवसीय प्रवास पर 17 दिसंबर को सिलीगुड़ी पहुंच रहे है। वह उत्तरायण में ठहरेंगे। मिली जानकारी के अनुसार यहां एक चिकित्सक और चाय उधोग से जुड़े कारोबारी स्वयंसेवक के यहां रुकना है। 18 को संघ प्रमुख सेवक रोड स्थित शारदा शिशु तीर्थ स्कूल में युवा स्वयंसेवकों को संबोधित करेंगे। यहां 15 से 35 वर्ष के स्वयंसेवकों को पूर्ण गणवेश में आने के अनुमति है। इसके लिए रजिस्ट्रेशन भी करवाया जा रहा है।5000 का लक्ष्य था पर जी जानकारी मिल रही है उसके अनुसार 8000से ज्यादा लोगों ने अपना रजिस्ट्रेशन करवा लिया है। संघ के प्रति युवाओं का रुझान समाज और राष्ट्र के लिए अच्छी खबर है। अपने प्रवास के दौरान शहर में उत्तर बंग मारवाड़ी पैलेस में वह प्रबुद्ध लोगों से मिलेंगे और संबोधित करेंगे। प्रवास के दौरान संघ प्रमुख से मिलने सांसद और विधायक के साथ पुराने स्वयंसेवक भी जा सकते है। 19 दिसंबर को कोलकोता लौटने का कार्यक्रम है। स्थापना से देश विभाजन तक संघ ने राजनीतिक क्षेत्र में जाने का विचार भी नहीं किया था: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1925 से 1948 तक राजनीतिक क्षेत्र में काम करने के विषय में सोचा भी नहीं था। राजनीति, संघ की प्राथमिकता में आज भी नहीं है। संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार से जब किसी ने पूछा कि संघ क्या करेगा? तब डॉक्टर साहब ने उत्तर दिया- “संघ व्यक्ति निर्माण करेगा।” अर्थात् संघ समाज के प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करने के लिए ऐसे नागरिकों का निर्माण करेगा, जो अनुशासित, संस्कारित और देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत हों। महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब संघ को कुचलने के लिए राजनीति का निर्लज्ज उपयोग किया गया, तब पहली बार यह विचार ध्यान में आया कि संसद में संघ का पक्ष रखने वाला कोई राजनीतिक दल भी होना चाहिए। क्योंकि स्वयंसेवकों को बार-बार यह बात कचोट रही थी कि गांधीजी की हत्या के झूठे आरोप लगाकर विरोधियों ने सत्ता की ताकत से जिस प्रकार संघ को कुचलने का प्रयास किया है, भविष्य में इस तरह फिर से संघ को परेशान किया जा सकता है। राजनीतिक प्रताड़ना के बाद ही इस बहस ने जन्म लिया कि संघ को राजनीति में हस्तक्षेप करना चाहिए। विचार-मन्थन शुरू हुआ कि आरएसएस स्वयं को राजनीतिक दल में बदल ले यानी राजनीतिक दल बन जाए या राजनीति से पूरी तरह दूर रहे या किसी राजनीतिक दल को सहयोग करे या फिर नया राजनीतिक दल बनाए। स्वयं को राजनीतिक दल में परिवर्तित करने पर संघ का विराट लक्ष्य कहीं छूट जाता। उस समय कोई ऐसा राजनीतिक दल नहीं था, जो संघ की विचारधारा के अनुकूल हो। इसलिए किसी दल को सहयोग करने का विचार भी संघ को त्यागना पड़ा।
डॉक्टर श्यामा प्रसाद ने 1951 में कुछ स्वयंसेवकों को लेकर बनाई थी जनसंघ: कांग्रेस की गलत नीतियों से मर्माहत होकर 8 अप्रैल, 1950 को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल से इस्तीफा देने वाले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी संघ के सरसंघचालक श्रीगुरुजी के पास सलाह-मशविरा करने के लिए आए थे। वे नया राजनीतिक दल बनाने के लिए प्रयास कर रहे थे। श्रीगुरुजी से संघ के कुछ कार्यकर्ता लेकर डॉ. मुखर्जी ने अक्टूबर, 1951 में जनसंघ की स्थापना की। वर्ष 1952 के आम चुनाव में जनसंघ ने एक नये राजनीतिक दल के रूप में भाग लिया। जनसंघ को मजबूत करने में संघ के प्रचारक नानाजी देशमुख, बलराज मधोक, भाई महावीर, सुंदर सिंह भण्डारी, जगन्नाथराव जोशी, लालकृष्ण आडवाणी, कुशाभाऊ ठाकरे, रामभाऊ गोडबोले, गोपालराव ठाकुर और अटल बिहारी वाजपेयी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चूंकि संघ के कार्यकर्ता ही जनसंघ का संचालन कर रहे थे इसलिए संघ ने जनसंघ को स्वतंत्र छोड़कर दूसरे आयामों पर अधिक ध्यान देना जारी रखा।

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