मूल की पुकार” कार्यक्रम में गांव से जुड़ाव और रिवर्स माइग्रेशन पर जोर

 

राजू बोहरा /वरिष्ठ संवाददाता

नई दिल्ली स्थित उत्तराखंड सदन में आयोजित “मूल की पुकार” कार्यक्रम की शुरुआत उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय मेजर जनरल भुवन चन्द्र खण्डूरी को श्रद्धांजलि अर्पित कर की गई। उपस्थित सभी लोगों ने खड़े होकर दो मिनट का मौन रख दिवंगत पुण्यात्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
कार्यक्रम में दिल्ली एनसीआर से पहुंचे प्रवासी उत्तराखंडवासियों एवं गणमान्य अतिथियों का स्वागत सार्वभौमिक संस्था के अध्यक्ष अजय सिंह बिष्ट ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में “अपनी गणना अपने गांव” अभियान को जनआंदोलन बनाने का आह्वान करते हुए रिवर्स माइग्रेशन, परिसीमन तथा उत्तराखंड के गांवों को पुनर्जीवित करने जैसे महत्वपूर्ण विषयों की ओर वक्ताओं और समाज का ध्यान आकर्षित किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ताओं जोत सिंह बिष्ट, मथुरा दत्त जोशी एवं प्रेम बहुखण्डी ने उत्तराखंड के गांवों से लगातार हो रहे पलायन पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि प्रवासी समाज अपनी जड़ों से जुड़कर गांवों में जनगणना सुनिश्चित करे तो विकास योजनाओं को गति मिलेगी और राज्य की मूल भावना सुरक्षित रह सकेगी।
इस अवसर पर बद्री प्रसाद अन्थवाल, दुर्गा सिंह भंडारी, नीरज बवाड़ी, मंगल सिंह नेगी सहित अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। सभी ने सामूहिक संकल्प लिया कि प्रवासी उत्तराखंडवासी अपनी गणना गांवों में ही कराएंगे, ताकि ग्राम पंचायतें मजबूत हों और पहाड़ों में विकास का पहिया निरंतर चलता रहे।
वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड का हिमालय केवल भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। “हिमालय पुत्रों का हिमालय था और रहेगा” की भावना के साथ वक्ताओं ने हिमालय की मर्यादा और पहाड़ी संस्कृति को संरक्षित रखने का संदेश दिया।
कार्यक्रम में इस बात पर भी जोर दिया गया कि दिल्ली सहित देशभर में जहां-जहां उत्तराखंड मूल के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं, वहां इस प्रकार की जनजागरण गोष्ठियों का आयोजन किया जाना चाहिए। वक्ताओं ने मातृशक्ति को इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बताते हुए कहा कि गांवों से जुड़ाव बनाए रखने और “अपनी गणना अपने गांव” अभियान को सफल बनाने में महिलाओं की भूमिका निर्णायक होगी।
कार्यक्रम का समापन उत्तराखंड के गांवों को पुनः आबाद करने, पलायन रोकने और राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता को सशक्त बनाने के सामूहिक संकल्प के साथ किया गया

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