मध्य प्रदेश के दतिया की सुपरिचित लेखिका डॉ मंजू शकुन खरे से राजीव कुमार झा की बातचीत!

साहित्य संसार: साक्षात्कार

दतिया बुंदेला राजाओं की नगरी रही है। मिनी वृंदावन नाम के अनुरूप ही दतिया धार्मिक आस्था से ओतप्रोत सुंदर भावमयी भूमि है!

प्रश्न:आप दतिया की रहने वाली हैं। इस छोटे से शहर और यहां के परिवेश की कुछ उल्लेखनीय बातों की चर्चा किस तरह से करना पसंद करेंगी?

उत्तर: दतिया मध्य प्रदेश का एक छोटा शहर होते हुए भी अपनी विशिष्ट पहचान रखता हैं। दतिया ‘ ‘ पीताम्बरा शक्ति पीठ के लिए राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात है, जहाँ माँ बगुलामुखी देवी की स्थापना की गई है। यह एक सिद्ध साधना साधनास्थल है। इसके साथ ही अपने धार्मिक- आध्यात्मिक वातावरण व मंदिरों की बहुलता के कारण इसको ‘ लघु वृन्दावन’ कहा जाता है। दतिया बुन्देला राजाओं की नगरी रही है। राजा वीर सिंह जूदेव द्वारा महल ,छतरी व अनेक तालाबों का निर्माण यहाँ करवाया गया है। सीता सागर, करण सागर , लाला का ताल इत्यादि। दतिया से लगभग 15 किमी दूरी पर प्रसिद्ध जैन तीर्थ स्थल सोनागिरि है । माता रतनगिरि मंदिर जो सेंवढ़ा मार्ग पर दतिया से 65 किमी दूरी पर स्थित है, आस्था का प्रमुख केंद्र है और जहाँ नवरात्रि पर विशाल मेला लगता है । दतिया से लगभग 19 किमी की दूरी पर पहुज नदी के तट पर उन्नाव बालाजी का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर है, जहांँ मकर संक्रांति के अवसर पर भव्य मेला लगता है और यह स्थल चर्म रोगों से निवारण हेतु प्रसिद्ध है। दतिया कवि-साहित्यकारों और विद्वान मनीषियों की भूमि है जो राजा दन्तवक्र से संबंधित है और जिसका एक अन्य नाम दिलीप नगर भी रहा है। मिनी वृन्दावन नाम के अनुरूप ही दतिया धार्मिक आस्था से ओत-प्रोत सुन्दर भावमयी भूमि है ,जहाँ सहजता और सरलता न केवल वेशभूषा में साथ ही आचरण व जनमानस के ह्दय में भी निवास करती है।

प्रश्न: आपका कविता लेखन की ओर ज्यादा झुकाव है। कविता के प्रति आपके हृदय में कब अनुराग कायम हुआ? आप किन – किन विषयों पर कविताएं लिखना पसंद करती हैं?

उत्तर : बाल्यावस्था में ही प्रकृति की सुन्दरता ने मुझे अपनी ओर बेहद आकर्षित किया। बारिश, तितली, चाँद , रंग- बिरंगे फूल, हरियाली इन सभी से मुझे बहुत जुड़ाव था। काॅलेज में मेरे भाई प्रोफेसर थे , डाॅ शरद नारायण खरे जी और वो राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकार थे, तो मैं अक्सर उनके साथ काव्य गोष्ठी में जाने लगी। महाविद्यालय की पत्रिका में भी मैंने लिखा और रचनात्मक लेखन में विश्व विद्यालय स्तर पर मैं पुरस्कृत हुई। इसके पश्चात पारिवारिक उत्तरदायित्व और शिक्षिका पद के दायित्व निर्वाहन में संलग्न रहने के कारण मैं काफी समय तक साहित्य सृजन से दूर रही और अब पति श्री दिनेश श्रीवास्तव जी के प्रोत्साहन पर मैं पुनः इस क्षेत्र में उन्मुख हुई हूँ।
कविता लेखन में अगर प्रिय विषय की बात की जाए तो मेरी प्रथम पसंद प्रकृति है। परंतु मेरी लेखनी किसी एक विषय विशेष पर केंद्रित न होकर अनेक विषयवस्तु को समेटती चली है। देश- भक्ति, मातृभूमि, पर्यावरण, घर-परिवार , समाज व आध्यात्मिकता से लेकर प्रेम की गहन अनुभूति आदि बिंदुओं पर छंदबद्ध व मुक्त दोनों प्रकार की रचनाएं की हैं। बेरोजगारी की समस्या,बढ़ते हुए वृद्धाश्रम व मनुष्य का नैतिक पतन ये सभी पर मैंने अपने विचार व भाव प्रस्तुत किए हैं।

प्रश्न: हिंदी में गजल लेखन निरंतर लोकप्रिय होता जा रहा है। इसकी क्या वजह है?

उत्तर: गज़ल लेखन की लोकप्रियता का प्रमुख कारण उसकी गेयता है। गज़ल की जो शैली है , वो आसानी से दिल में उतर जाती है और मन में कोमलता ,प्रेम व करूणा के भाव उत्पन्न कर देती हैं।प्रायः गज़ल क्लिष्ट नहीं होतीं और प्रेम की गहन अनुभूति से भरी होती हैं , इसलिए इनको श्रोता वर्ग बहुत पसंद करने लगा है।और निरन्तर इनका दायरा बढ़ता जा रहा है।कहा जा सकता है कि गजल की विशेषताएं छंदबद्धता, संक्षिप्तता और सारगर्भिता होने के साथ ही इसकी विषय वस्तु का प्रेम- रोमांस से संबद्ध होना भी इसकी लोकप्रियता के प्रमुख कारण है।

प्रश्न :आज समाज में ऐसा माना जाता है कि हिंदी के प्रति नयी पीढ़ी में प्रेम और लगाव की भावना में कमी आ रही है। इसके बारे में अपने विचारों से अवगत कराइए।

उत्तर: हाँ, वैश्वीकरण के कारण जबकि पूरा विश्व एक वैचारिक धरातल पर सिमटता जा रहा है तो , सुविधानुसार हम अन्य भाषाओं के शब्द भी ग्रहण करने लगे हैं। परन्तु ऐसा हम केवल सुविधा के दृष्टिकोण से ही करते हैं ।हमारी मातृभाषा हिन्दी है और हम इसके गौरव से पूर्णतया परिचित हैं। हम प्रायः देखते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत युवा के लिए आंग्ल भाषा में दक्ष होना अनिवार्य समझा जाता है।इसको हम अपनी हिन्दी का अवमूल्यन नहीं कह सकते हैं और ऐसी मानसिकता होना भी नहीं चाहिए। आज अनेक साहित्य पटल इस क्षेत्र में कार्यरत हैं और जैसा कि भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी ने कहा है-” निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल” उसी दिशा में पूर्णतया
समर्पित व अग्रसर हैं।

प्रश्न :सोशल मीडिया के माध्यम से साहित्य अब फिर से समाज और लोगों के जीवन के करीब आता महसूस हो रहा है। क्या इस बात से आप सहमत हैं? संक्षेप में इसके बारे में बताइए।

उत्तर: अवश्य… सोशल मीडिया वर्तमान में साहित्य को न केवल समाज व जनमानस के करीब ला रहा है, बल्कि उसको एक नई दिशा व राह भी दिखा रहा है। प्रगतिवाद के पश्चात साहित्य में वैयक्तिक अनुभूतियाँ बहुत प्रसार पाती गईं । साहित्य का व्यापक व मार्गदर्शक स्वरूप क्रमशः क्षीण होता गया। परन्तु अब पुनः साहित्य अपने लोककल्याणकारी स्वरूप में विस्तार पा रहा है और अपने दायित्व निर्वहन हेतु सजग होता जा रहा है। वस्तुतः साहित्य न केवल समाज का दर्पण है बल्कि वह यथोचित दिशा निर्देशक भी है। प्रसन्नता की बात है कि सोशल मीडिया ने अपने कर्तव्य को समझा है और समाज में व्याप्त दुष्प्रवृतियों को सामने लाकर , उनका विनाश करने का शुभ कार्य किया है। सोशल मीडिया मानव जीवन पर गहरा असर डालता है और उसके विचार , आचरण को गहराई से प्रभावित करता है। ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया का सकारात्मक होना मानव के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं।

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