छत्तीसगढ़ के लेखक डॉ. सुधीर शर्मा से राजीव कुमार झा की बातचीत
साहित्य: साक्षात्कार
प्रश्न 1. छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद साहित्य, संस्कृति और कला के संरक्षण-विकास के लिए सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर क्या प्रयास हो रहे हैं?
उत्तर: छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार हुआ है। राज्य सरकार ने संस्कृति विभाग, पुरातत्व एवं संग्रहालय, विभिन्न अकादमियों तथा विश्वविद्यालयों के माध्यम से लोककलाओं, जनजातीय संस्कृति, छत्तीसगढ़ी भाषा और हिंदी साहित्य के संरक्षण के अनेक महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। राज्योत्सव, राजभाषा संबंधी गतिविधियां, साहित्यकार सम्मान, पुस्तक प्रकाशन, सांस्कृतिक महोत्सव तथा युवा प्रतिभाओं को मंच उपलब्ध कराने जैसी योजनाओं ने सकारात्मक वातावरण बनाया है। गैर-सरकारी संस्थाओं, साहित्यिक मंचों, शोध संस्थानों और सामाजिक संगठनों ने भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। निरंतर संगोष्ठियां, व्याख्यान, पुस्तक विमोचन, साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन और ऑनलाइन साहित्यिक गतिविधियां इस बात का प्रमाण हैं कि छत्तीसगढ़ का साहित्यिक समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति सजग और प्रतिबद्ध है।
प्रश्न 2. छत्तीसगढ़ी के प्रमुख लेखकों के बारे में बताइए।
उत्तर: छत्तीसगढ़ी साहित्य अत्यंत समृद्ध और जीवंत परंपरा का साहित्य है। हरि ठाकुर, कोदूराम दलित, दानेश्वर शर्मा, लक्ष्मण मस्तुरिहा, नरेंद्र देव वर्मा, पवन दीवान, पालेश्वर शर्मा, सुरेंद्र दुबे आदि अनेक साहित्यकारों ने इसे नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। इन रचनाकारों ने लोकजीवन, लोकभाषा, किसानों, श्रमिकों, आदिवासी समाज, लोकसंस्कृति और मानवीय संवेदनाओं को अपनी रचनाओं का आधार बनाया। आज नई पीढ़ी के लेखक भी छत्तीसगढ़ी साहित्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
प्रश्न 3. आपने विद्यानिवास मिश्र के ललित निबंध लेखन पर पुस्तक लिखी है। ललित निबंध के विकास में उनका योगदान कैसे देखते हैं?
उत्तर: मेरे शोध और लेखन का एक महत्वपूर्ण विषय विद्यानिवास मिश्र का ललित निबंध साहित्य रहा है। उनका लेखन भारतीय संस्कृति की गहरी समझ, लोकजीवन के प्रति आत्मीय दृष्टि और भाषा की अद्भुत सौंदर्य चेतना का परिचायक है। उन्होंने ललित निबंध को केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं रहने दिया, बल्कि उसे भारतीय जीवन-दर्शन, सांस्कृतिक स्मृति और मानवीय संवेदना का सशक्त माध्यम बनाया। उनकी भाषा में विद्वत्ता है, लेकिन वह बोझिल नहीं होती। उसमें आत्मीयता है, सहजता है और भारतीयता की गहरी सुगंध है। मेरा मानना है कि हिंदी के ललित निबंध को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 4. आपके घर-परिवार, माता-पिता और शिक्षा-दीक्षा के बारे में जानना चाहेंगे।
उत्तर: मेरा जन्म एक सामान्य भारतीय परिवार में हुआ, जहां शिक्षा, संस्कार और परिश्रम को जीवन का आधार माना जाता था। माता-पिता ने अध्ययन, अनुशासन और सामाजिक संवेदनशीलता के जो संस्कार दिए, वही आगे चलकर मेरे व्यक्तित्व और लेखन की आधारशिला बने। शिक्षा के दौरान हिंदी साहित्य के प्रति मेरी रुचि निरंतर बढ़ती गई। आगे चलकर शोध, अध्यापन, लेखन और संपादन मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए। आज भी मैं स्वयं को सबसे पहले एक विद्यार्थी मानता हूं, क्योंकि साहित्य में सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती।
प्रश्न 5. हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए आयोजित सम्मेलनों में आपकी सक्रिय भागीदारी रही है। विश्वभाषा के रूप में हिंदी के विकास को कैसे देखते हैं?
उत्तर: देश-विदेश में आयोजित अनेक हिंदी सम्मेलनों और साहित्यिक आयोजनों में भाग लेने का अवसर मिला। इन अनुभवों ने यह विश्वास और मजबूत किया कि हिंदी आज विश्व स्तर पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों, डिजिटल माध्यमों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में हिंदी की संभावनाएं पहले से कहीं अधिक बढ़ी हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम हिंदी में ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, प्रबंधन और शोध का उच्चस्तरीय साहित्य विकसित करें। हिंदी तभी वास्तविक अर्थों में विश्वभाषा के रूप में स्थापित होगी।
प्रश्न 6. कविता लेखन से भी आपका विशेष लगाव है। उसके बारे में कुछ बताइए।
उत्तर: कविता मेरे लिए मन की सहज अभिव्यक्ति है। जीवन में जब भी कोई अनुभव, कोई पीड़ा, कोई आनंद या कोई सामाजिक विसंगति मन को गहराई से स्पर्श करती है, वह कविता का रूप ले लेती है। मेरी कविताओं में प्रकृति, मनुष्य, भारतीय संस्कृति, सामाजिक सरोकार, समय की विडंबनाएं और मानवीय रिश्तों की ऊष्मा प्रमुख रूप से दिखाई देती है। मेरा विश्वास है कि कविता मनुष्य को अधिक संवेदनशील और अधिक मानवीय बनाती है।
प्रश्न 7. हिंदी साहित्य में छत्तीसगढ़ का क्या योगदान है?
उत्तर: छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य की अत्यंत उर्वर भूमि रही है। आधुनिक हिंदी की प्रथम मौलिक कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ के रचनाकार माधवराव सप्रे से लेकर पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडेय, गजानन माधव मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल जैसे साहित्यकारों ने हिंदी साहित्य को नई दृष्टि और नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। लोकसंस्कृति, जनजातीय जीवन, लोककथाएं, लोकगीत और यहां की बहुरंगी सांस्कृतिक परंपरा ने हिंदी साहित्य को निरंतर समृद्ध किया है। मेरा विश्वास है कि आने वाले समय में भी छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य के राष्ट्रीय परिदृश्य में अपनी विशिष्ट पहचान और अधिक सुदृढ़ करेगा।
डॉ. सुधीर शर्मा
अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग
कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई (छत्तीसगढ़)




