कवि उत्तम कुमार तिवारी “उत्तम” से राजीव कुमार झा की बातचीत

साहित्य: साक्षात्कार

 

प्रश्न 1: कविता लिखते हुए किन बातों पर मुख्य रूप से ध्यान देते हैं?

उत्तर: कविता के लेखन के समय मेरे मस्तिष्क में यही भाव रहता है कि शब्द छोटे और सहज हों – जो पाठकों की समझ में सरलता से आ जाएँ, जिनका अर्थ और भाव समझने के लिए किसी की सहायता न लेनी पड़े।

उदाहरण स्वरूप –
_”बहते अश्रु सदा आँखों से, हृदय गीत गाता दुःख के।
पेशानी पर खींची है रेखा, दुःख दर्शाती जीवन के।।”_

उपर्युक्त रचना में प्रत्येक शब्द सरल है। पाठक एक-एक शब्द का अर्थ सहजता से समझ सकता है।

प्रश्न 2: आप अपने प्रिय लेखकों-कवियों के बारे में बताइए?

उत्तर: मेरे प्रिय लेखक प्राचीन काल के मुंशी प्रेमचंद, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान हैं।

मुंशी जी की समस्त रचनाएँ सरल भाषा में हैं और यथार्थ का सजीव चित्रण करती हैं।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी के काव्य की प्रशंसा के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं –
“नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो कुछ काम करो”
यह कविता मनुष्य को निराशा, आलस्य और भाग्यवाद त्यागकर कर्मशील बनने की प्रेरणा देती है। कवि का संदेश है कि मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है और उसे अपने अमूल्य जीवन को सार्थक बनाते हुए समाज में अपना नाम कमाना चाहिए।

सुमित्रानंदन पंत जी की ‘नौका विहार’ देखिए –
_”शांत स्निग्ध ज्योत्स्ना उज्ज्वल, पलकें अनंत पर थीं झुकतीं।
शत-शत मुखरों का निर्झर-कल, मुखरित करता था जग का तल!”_
कितना सुंदर प्रकृति-वर्णन है, मंत्रमुग्ध कर देता है।

महादेवी वर्मा जी की विश्व-प्रसिद्ध रचना –
_”मैं नीर भरी दुःख की बदली! स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा, नयनों में दीपक-से जलते, पलकों में निर्झरिणी मचली!”_
इसमें कवयित्री ने अपने जीवन के दुःख, विरह-वेदना और अश्रुओं की तुलना जल से भरे बादल से की है।

सुभद्रा जी की रचना –
_”वीरों का कैसा हो वसंत? आ रही हिमाचल से पुकार,
है उदधि गरजता बार-बार… वीरों का कैसा हो वसंत?”_
इन महान कवियों की तुलना आज किसी से नहीं की जा सकती।

प्रश्न 3: अपने गाँव और वहाँ घर-परिवार, माता-पिता और शिक्षा-दीक्षा के बारे में बताइए?

उत्तर: मैं मुख्य रूप से जिला रायबरेली, रियासत शिवगढ़, ग्राम राजापुर माफ़ी का मूल निवासी हूँ। यह गाँव मेरे परबाबा को ‘वासिके’ में मिला था, जहाँ से लगान नहीं ली जाती थी। वर्तमान में मैं लखनऊ में रहता हूँ। मेरे पिताजी स्व. पंडित देवी दयाल तिवारी जी अत्यंत विद्वान थे। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम.ए. किया था। उन्होंने संपूर्ण श्रीरामचरितमानस अपने हाथ से लिखकर मुझे उपहारस्वरूप प्रदान किया था। मेरी माताजी स्व. श्रीमती राम निहोरी तिवारी जी गृहिणी थीं। उन्हें रामचरितमानस एवं श्रीमद्भागवत पुराण लगभग कंठस्थ थे। साथ ही महाभारत और श्रृंगार रस की लगभग सात सौ कविताएँ याद थीं। एक उदाहरण –

_चक्रपाणि चक्र भी तुम्हारी, चक्र दृष्टि भी…
होते ही प्रभात जयद्रथ क्यों न मारा जाय…
निर्दोष उत्तरा का नथ सिंदूर उतारा जाय…
मारा जाय तो भी अभिमन्यु भी हमारा हाय…
केशव कहो कैसे ही तुमसे निहारा जाय_

भगवान का उत्तर –
_चक्रपाणि क्या करे, मिटेगा विधि अंक नहीं…
लेखनी उसी की ही उसी रोज ही सै क्षय गई…
जिस दिन गया था वह वीर रण संगर में…
चक्रव्यूह द्वारा उसे सिंघरी अथै गई…
इसमें है पारथ हमारा कछु दोष नहि…
आया था काल औ छिन में प्रलय भई…
दोष न लगाओ कछु रोष न बढ़ाओ…
उसी भाग्य को सराहो जोन भाग्य उसे लै गई_

मेरे दो भाई और चार बहनें हैं। मेरा एक पुत्र और एक पुत्री है, दोनों विवाहित हैं। मेरी पत्नी एक कुशल गृहिणी हैं।

प्रश्न 4: लखनऊ उर्दू अदब का शहर है। इससे अपने दिल का कैसा लगाव महसूस किया?

उत्तर: उर्दू के महान शायरों में मुझे शेख बाक़र अली “बाक़ी” बहुत पसंद हैं –
_”दस्त से खाना खिलाया मैंने अपने यार को,
पानी जब माँगा तो हमने पेश-आब कर दिया।”_
क्या उम्दा पंक्ति है!

प्रश्न 5: सोशल मीडिया पर कविता पाठ और लेखन लोकप्रिय हुए हैं?

उत्तर: सोशल मीडिया से कविताएँ जनसाधारण तक अवश्य पहुँच रही हैं, जिससे कविताओं के प्रति लगाव बढ़ा है। परंतु एक बड़ी विडंबना यह भी है कि पुस्तकों की बिक्री बहुत कम हो गई है। आज सब कुछ सोशल मीडिया पर उपलब्ध है।

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