उत्तर प्रदेश के पूरनपुर, पीलीभीत की लेखिका-समाजसेवी संगीता सिंघल ‘विभु’ से राजीव कुमार झा की बातचीत
साहित्य: साक्षात्कार
“लेखनी और समाजसेवा, दोनों संस्कारों से मिलीं ।”
प्रश्न 1: समाज सेवा के कार्यों में आप किन सामाजिक संस्थाओं से जुड़ी हैं?
उत्तर: मैं ‘जागृति गृहिणी समिति’ की राष्ट्रीय अध्यक्ष हूँ। हमारा मुख्य कार्य गरीबों-वंचितों की सहायता करना है। इसके अलावा ‘भारत विकास परिषद’ में महिला सहभागिता प्रमुख और ‘सहकार भारती’ में जिला प्रमुख के दायित्व पर हूँ। ‘अग्रवाल सभा’ की संस्थापक संरक्षक भी हूँ।
प्रश्न 2: आपने साहित्य की किन विधाओं में लेखन किया है?
उत्तर: मैंने लघुकथा, गीत-ग़ज़ल, छंदमुक्त कविता और आलेख – इन सभी विधाओं में लेखन किया है। मेरी रचनाएँ सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी होती हैं।
प्रश्न 3: अपने परिवार के बारे में बताएं। पीलीभीत शहर की क्या विशेषता है?
उत्तर: मेरे पति साधारण बीमा निगम में प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं। मेरे दो बेटे और एक बेटी है। मेरी माता स्वयं साहित्यकार थीं, उन्होंने दो विषयों में पीएच.डी. की थी। पिता पत्रकार थे। उनका समाचार पत्र ‘बीकानेर टाइम्स’ आज भी प्रकाशित होता है। पीलीभीत जंगलों से घिरा प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर शहर है। यहाँ का टाइगर रिज़र्व प्रसिद्ध है। यह गोमती नदी का उद्गम स्थल भी है। काली माता के सुंदर मंदिर से सुशोभित पूरनपुर, पीलीभीत जिले का सबसे बड़ा ब्लॉक है। माता के साहित्यकार होने के कारण मेरा अज्ञेय जी से भी व्यक्तिगत परिचय रहा। प्रेमचंद, महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद से प्रेरणा लेकर मैंने लिखना शुरू किया।
प्रश्न 4: राजनीति में भी आपकी रुचि रही है। इस क्षेत्र में अपने अनुभव बताइए?
उत्तर: जी हाँ, राजनीति में मेरी गहरी रुचि है। मैं शुरू से भारतीय जनता पार्टी की समर्थक रही हूँ। मेरे पिता अटल बिहारी वाजपेयी जी के संगी थे और जनसंघ के विचारों से प्रेरणा लेते थे। राजनीति में कार्य करना आसान नहीं होता। मेरा मानना है कि राजनीति में सिर्फ ‘नीति’ हो, वह ‘कूटनीति’ न बने तभी सार्थक है। मैंने माननीय योगेंद्र जी की संघ प्रेरित संस्था ‘संस्कार भारती’ की लगभग 20 वर्षों तक अध्यक्षता की है। मेरा अनुभव है कि राजनीतिक-सामाजिक संस्थाएँ सभी भारतीय संस्कृति और उसके स्रोतों को प्रेरित करने का प्रयास करती हैं।
आत्माभिव्यंजना : संगीता सिंघल ‘विभु’
भावों को अभिव्यक्ति का जामा पहनाना कठिन है। कभी शब्द नहीं मिलते, कभी भाव-संवेदना होते हुए भी शब्दावली के बिना उत्कृष्ट साहित्य सृजना मुश्किल लगता है।
पत्रकार दुष्यंत गुप्त एवं साहित्यकार सुशीला की आठवीं संतान के रूप में मेरा जन्म हुआ। कक्षा आठ की छात्रा थी जब किशोरावस्था की दहलीज़ पर कदम रखा। मन जिज्ञासु और महत्वाकांक्षी हो चला।
उन्हीं दिनों माँ के साथ एक कवि सम्मेलन में जाने का अवसर मिला। वहाँ सच्चिदानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ से मुलाक़ात हुई। उनके श्वेत वर्ण, सौंदर्य से दीप्त मुखारविंद को देख मैं आकर्षित हो गई। उसी दिन पहली बार उन्हीं की वाणी में सुना – ‘सांप तुम सभ्य… विष कहाँ पाया’। मेरा मस्तिष्क हिलोरें लेने लगा, हाथ कुछ लिखने को बेताब हुए। तब पहली कविता लिखी:
खुद को विद्वान् कहने से, विद्वान भी महान नहीं होता,
खुद पाप ना किया हो, ऐसा कोई इंसान नहीं होता,
जिंदगी ईश्वर हाथ बंधी है ये दोस्त मगर,
खुद को खुदा कहने वाला भगवान नहीं होता…
ना विधा का ज्ञान था, ना रचना का अर्थ। बस मन का भाव अभिव्यक्त करना था। माता-पिता के कारण कर्मठता और सिद्धांतों पर जीना मेरे संस्कारों में था। मेरा लेखन ही मेरा व्यक्तित्व निर्धारित करता है।
मेरे लेखन की राह में परिवार, भाई-बहनों तथा पति ने हमेशा साथ दिया। मैं जो भी उल्टा-सीधा लिखती, वे तारीफ करते ताकि और अच्छा लिख सकूँ।
शादी से पूर्व आकाशवाणी से सम्बद्ध रही। मेरी रचनाएँ ‘युगवाणी’ के अंतर्गत आती रहीं। बीकानेर में ‘युग पक्ष’ और ‘दैनिक भास्कर’ में भी रचनाएँ प्रकाशित हुईं। आगरा से प्रकाशित ‘युवक पत्रिका’, अहमदाबाद से ‘सुधा बिंदु’ और लखनऊ से ‘प्रतिभा’ में मेरी रचनाएँ निरंतर छपती रहीं।
मेरा बड़ा बेटा दिव्यांग होने के बावजूद मेरी लेखनी की बैसाखी बना। छोटा बेटा नन्हें हाथों से कागज थमाता, बेटी मेरी छोटी रचनाओं को गीत की तरह गाती थी। आचार्य देवेंद्र देव, जिन्होंने 19 महाकाव्य लिखे, मेरी प्रेरणा बने। मैंने ‘सतरंगी दुनिया’ पत्रिका का लगभग 3 वर्ष तक संपादन किया।
कविताओं की पुस्तक छपवाने का स्वप्न था। सामाजिक दायित्वों के बीच आखिर ‘स्वप्नांजलि सपनों के बीच’ प्रकाशित हुई। कोरोना काल में एक पुस्तक का संपादन किया। ‘जागृति’ समाज से जुड़ी आस्थाओं को ध्यान में रखकर मैंने नाटक भी लिखे – ‘कब झुकेगा आसमां’, ‘समाज फिर बदल डालो’ का मंचन भी हुआ।
मेरी ग़ज़लें सुर-बद्ध हुईं। विभिन्न समूहों ने मुझे ‘राष्ट्र हितैषी’, ‘सरस्वती सम्मान’, ‘प्राणेश विजेता’ आदि से सम्मानित किया। ‘पुनीत अनुपम साहित्यिक समूह’ ने पहली ही रचना पर ‘पुनीत साहित्य रत्न सम्मान’ दिया। इस तरह चलता रहा मेरे लेखन का सफर।
मैं भोर की किरण, उगते सूरज के आगे नतमस्तक हूँ,
जो मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे।
कलकल बहती नदियों, चहकती चिड़ियों और प्रकृति की शुक्रगुजार हूँ।
राह के पत्थर भी सहायक रहे, जिन्होंने संभल कर चलना सिखाया।
बहती हवाओं, आते-जाते मौसम का भी धन्यवाद।
सुख-दुःख के समावेश ने जीवन-परिवर्तन सिखाया।
बरखा की एक-एक बूंद की आभारी हूँ जिसने ‘सावन सूखे ना भादों हरे’ का संदेश दिया।
गर्म लू ने थपेड़े सहन करने का पाठ पढ़ाया।
यूँ चला आसपास के पशु-पक्षी, कीट-कीटाणु, तितली-भंवरों के सानिध्य में लेखन सफर।
प्रेरणा के रस भर प्यार का सम्बल बन जाये,
लिख कुछ ऐसा कि लोहा भी कंचन बन जाये।
बहने लगे भावों की अमृत शब्द लहरिया ‘विभु’,
सावन-सा लगे पतझर, मरुस्थल उपवन बन जाये।
परिचय:
नाम: संगीता सिंघल ‘विभु’
जन्मदिन: 28 अगस्त
शिक्षा: एम.ए., बी.एड.
अभिरुचि: संगीत, साहित्य व कला
प्रकाशित पुस्तक: स्वप्नांजलि सपनों के बीच, शिवाभिकृति अनिल, स्निग्ध व्यथा, जागृति पत्रिका का सम्पादन
विशेष: अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित, आकाशवाणी से जुड़ाव
निवास: पूरनपुर, पीलीभीत
उत्तर प्रदेश



