शांतिनिकेतन में गूंजा गुरुदेव का स्मरण, ‘बाइशे श्रावण’ पर वैतालिक से शुरू हुआ श्रद्धांजलि का सिलसिला

विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि पर विश्वभारती में विशेष प्रार्थना सभा, रवींद्र संगीत और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच दी श्रद्धांजलि

 

अजित प्रसाद / शांतिनिकेतन। विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि ‘बाइशे श्रावण’ शनिवार को शांतिनिकेतन में पारंपरिक रीति-रिवाजों और गहरी श्रद्धा के साथ मनाई गई। बंगाली संवत 1348 की 22 श्रावण को गुरुदेव ने अंतिम सांस ली थी। इसी ऐतिहासिक दिन की स्मृति में हर वर्ष शांतिनिकेतन में विशेष आयोजन किए जाते हैं। इस वर्ष भी तड़के से ही शांतिनिकेतन का वातावरण रवींद्र संगीत, वैदिक मंत्रोच्चार और गुरुदेव की स्मृतियों से सराबोर रहा।

‘बाइशे श्रावण’ के अवसर पर दिन की शुरुआत गौर प्रांगण में आयोजित पारंपरिक वैतालिक से हुई। सुबह आश्रमवासी, विश्वभारती विश्वविद्यालय के शिक्षक-कर्मचारी, विद्यार्थी और श्रद्धालु वैतालिक में शामिल हुए। प्रभात फेरी के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाओं और गीतों का गायन किया गया। शांतिनिकेतन की इस पुरानी परंपरा ने एक बार फिर गुरुदेव के उस विचार को जीवंत किया, जिसमें शिक्षा, प्रकृति, संगीत और आध्यात्मिकता को जीवन का अभिन्न हिस्सा माना गया था।

विशेष प्रार्थना सभा में उमड़ी श्रद्धा

वैतालिक के बाद विश्वभारती विश्वविद्यालय परिसर में विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। इसमें विश्वभारती के प्रभारी कुलपति प्रबीर कुमार घोष के साथ विश्वविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी, छात्र-छात्राएं और आश्रमवासी शामिल हुए। प्रार्थना सभा में रवींद्र संगीत और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

पूरे कार्यक्रम के दौरान शांतिनिकेतन का वातावरण गंभीर और आध्यात्मिक बना रहा। उपस्थित लोगों ने गुरुदेव के साहित्य, संगीत, शिक्षा और मानवतावादी विचारों को याद किया।

उपासना गृह से उदयन गृह तक निकली शोभायात्रा

विशेष प्रार्थना सभा के बाद कांच मंदिर यानी उपासना गृह से उदयन गृह तक पारंपरिक शोभायात्रा निकाली गई। इस दौरान श्रद्धालु रवींद्रनाथ टैगोर के प्रसिद्ध गीत ‘आगुनेर परशमोनि’ का सामूहिक गायन करते हुए आगे बढ़े।

शोभायात्रा उदयन गृह पहुंची, जहां गुरुदेव की स्मृतियों से जुड़ी ऐतिहासिक वस्तुओं के बीच उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। वहां गुरुदेव द्वारा उपयोग की जाने वाली ऐतिहासिक कुर्सी पर पुष्पचक्र अर्पित किया गया। प्रभारी कुलपति प्रबीर कुमार घोष सहित विश्वविद्यालय के शिक्षकों, कर्मचारियों और आश्रमवासियों ने पुष्पांजलि अर्पित कर गुरुदेव को नमन किया।

दिनभर जारी रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम

‘बाइशे श्रावण’ के अवसर पर शांतिनिकेतन में गुरुदेव की स्मृतियों से जुड़े विभिन्न स्थानों पर भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए गए। दिनभर रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाओं, गीतों और कविताओं के माध्यम से उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान को याद किया गया।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों और स्मरण सभाओं में गुरुदेव के जीवन-दर्शन पर चर्चा हुई। नई पीढ़ी को उनकी रचनाओं और विचारों से जोड़ने का संदेश भी दिया गया।

शांतिनिकेतन की परंपरा में आज भी जीवित हैं गुरुदेव

रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन को ऐसा शिक्षा केंद्र बनाने की कल्पना की थी, जहां प्रकृति, कला, साहित्य, संगीत और मानवीय मूल्यों का समन्वय हो। आज भी शांतिनिकेतन की परंपराओं में गुरुदेव के इसी दर्शन की झलक दिखाई देती है।

‘बाइशे श्रावण’ का आयोजन केवल पुण्यतिथि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गुरुदेव के विचारों और उनकी रचनात्मक विरासत को याद करने का अवसर भी है। साहित्य, संगीत, कविता, शिक्षा और कला के क्षेत्र में उनके योगदान ने भारतीय संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई।

शनिवार को शांतिनिकेतन में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान यह भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया कि समय बीतने के बावजूद रवींद्रनाथ टैगोर की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। उनकी रचनाएं आज भी मानवता, संवेदना, प्रकृति और स्वतंत्र चिंतन का संदेश देती हैं।

शांतिनिकेतन की धरती पर गूंजते रवींद्र संगीत और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच गुरुदेव को श्रद्धांजलि देते हुए लोगों ने उनकी स्मृतियों को नमन किया। ‘बाइशे श्रावण’ ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि रवींद्रनाथ टैगोर केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि भारतीय समाज और संस्कृति की जीवंत विरासत हैं। उनकी अमर कृतियां आने वाली पीढ़ियों को भी लगातार प्रेरित करती रहेंगी।

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