आज कौशिकी अमावस्या पर तारापीठ में लगेगा भक्तों का मेला
- रातभर होगी मां तारा की विशेष पूजा और साधना, देश-विदेश से पहुंचे साधक
– 15 लाख तक श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान, सुरक्षा के लिए हजारों जवान और स्वयंसेवक तैनात
– सीसीटीवी और ड्रोन से होगी निगरानी, बड़े वाहनों के प्रवेश पर नियंत्रण
अजित प्रसाद। /सिलीगुड़ी: आज गुरुवार को कौशिकी अमावस्या के अवसर पर पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले स्थित प्रसिद्ध तारापीठ में आस्था का बड़ा मेला लग रहा है। मां तारा के दर्शन और विशेष पूजा-अर्चना के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। प्रशासन का अनुमान है कि इस बार कौशिकी अमावस्या पर तारापीठ में आठ से 15 लाख तक श्रद्धालु पहुंच सकते हैं। इसे देखते हुए मंदिर परिसर से लेकर आसपास के इलाकों तक सुरक्षा और यातायात की विशेष व्यवस्था की गई है।
कौशिकी अमावस्या को मां तारा की आराधना के लिए विशेष दिन माना जाता है। आज सुबह 4.30 बजे मंगला आरती के साथ मंदिर में पूजा-अर्चना शुरू हुई। दिनभर श्रद्धालुओं के दर्शन का सिलसिला जारी रहेगा। वहीं, अमावस्या की रात तारापीठ के महाश्मशान में विशेष साधना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाने की परंपरा है। इस अवसर पर तंत्र साधना से जुड़े साधक भी बड़ी संख्या में तारापीठ पहुंचते हैं। रातभर विशेष पूजा-अनुष्ठान के बाद शुक्रवार सुबह भी श्रद्धालु मां तारा के दर्शन करेंगे।
पांच करोड़ रुपये का अनुदान
भारी भीड़ को देखते हुए राज्य सरकार की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा और व्यवस्थाओं के लिए करीब पांच करोड़ रुपये का अनुदान दिए जाने की जानकारी है। मंदिर परिसर में पर्याप्त रोशनी, पानी और बैरिकेडिंग की व्यवस्था की गई है। मंदिर कमेटी की ओर से भी सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के लिए अतिरिक्त इंतजाम किए गए हैं।
हजारों पुलिसकर्मी और स्वयंसेवक तैनात
कौशिकी अमावस्या को लेकर जिला प्रशासन और पुलिस ने सुरक्षा का व्यापक इंतजाम किया है। रामपुरहाट अनुमंडल पुलिस अधिकारी के अनुसार, तारापीठ में करीब एक हजार पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। इसके अलावा करीब तीन हजार नागरिक स्वयंसेवक भी व्यवस्था संभालने में सहयोग करेंगे। मंदिर और आसपास के क्षेत्रों में लगातार पुलिस गश्त और निरीक्षण किया जा रहा है।
सुरक्षा के लिए जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। ड्रोन के माध्यम से भीड़ और आसपास के इलाकों पर हवाई निगरानी की जाएगी। कुछ महत्वपूर्ण स्थानों पर वॉच टावर बनाए गए हैं। पुलिस और प्रशासन की कोशिश है कि श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बावजूद किसी तरह की अव्यवस्था उत्पन्न न हो।
बड़े वाहनों के प्रवेश पर नियंत्रण
भारी भीड़ को देखते हुए यातायात व्यवस्था में भी बदलाव किया गया है। बुधवार सुबह से ही तारापीठ जाने वाले मार्गों पर यातायात नियंत्रित किया जा रहा है। चांदपाड़ा और अम्मा मोड़ जैसे स्थानों से वाहनों की आवाजाही नियंत्रित की जा रही है। बड़े वाहनों को तारापीठ में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है, जबकि श्रद्धालुओं के छोटे वाहनों को निर्धारित व्यवस्था के तहत आगे जाने की अनुमति दी जा रही है।
सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध है तारापीठ
बीरभूम का तारापीठ धार्मिक आस्था के साथ-साथ तंत्र साधना के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर कमेटी के अध्यक्ष तारामय मुखोपाध्याय के अनुसार, वशिष्ठ मुनि की तपस्या और प्रसिद्ध साधक बामाखेपा की साधना से तारापीठ की प्रसिद्धि जुड़ी हुई है। यहां मां तारा से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं और लोक मान्यताएं प्रचलित हैं।
एक मान्यता के अनुसार, वशिष्ठ मुनि ने तारापीठ के आसपास कठोर तपस्या की थी। उनकी साधना से प्रसन्न होकर देवी ने तारा रूप में दर्शन दिए। वहीं, समुद्र मंथन के दौरान भगवान शिव द्वारा विषपान किए जाने और मां तारा द्वारा उन्हें मातृ रूप में स्तनपान कराने की कथा भी तारापीठ से जुड़ी है। हालांकि, तारापीठ की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं।
बामाखेपा की जन्मस्थली भी पहुंचते हैं श्रद्धालु
तारापीठ की पहचान प्रसिद्ध साधक बामाखेपा से भी गहराई से जुड़ी है। बामाचरण चट्टोपाध्याय, जिन्हें बामाखेपा के नाम से जाना जाता है, का जन्म 1837 में तारापीठ के निकट अतला गांव में हुआ था। बताया जाता है कि उन्होंने द्वारका नदी के किनारे और तारापीठ के महाश्मशान क्षेत्र में साधना की थी।
मां तारा के प्रति बामाखेपा की भक्ति और साधना से जुड़ी अनेक कथाएं आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रसिद्ध हैं। तारापीठ आने वाले कई भक्त मां तारा के दर्शन के साथ बामाखेपा की जन्मस्थली अतला गांव भी जाते हैं।
‘जीवित कुंड’ से जुड़ी जयदत्त की कथा
तारापीठ में स्थित ‘जीवित कुंड’ भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र है। इससे व्यापारी जयदत्त से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि जयदत्त के पुत्र की सर्पदंश से मृत्यु हो गई थी। इसी दौरान उनके एक सेवक ने शोल मछली को मंदिर के पास स्थित कुंड के पानी में धोया। लोकमान्यता है कि पानी में डालने के बाद मछली जीवित हो गई।
कहा जाता है कि यह सुनकर जयदत्त अपने मृत पुत्र को कुंड के पास ले गए और स्नान कराया। धार्मिक लोककथा के अनुसार, इसके बाद उनका पुत्र जीवित हो गया। इसी मान्यता के कारण इस कुंड को ‘जीवित कुंड’ कहा जाने लगा।
तारापीठ मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1818 में बीरभूम के मल्लारपुर के जमींदार जगन्नाथ राय द्वारा निर्मित कराया गया था। कौशिकी अमावस्या के मौके पर यहां हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार भी आज मां तारा के दरबार में भक्तों का सैलाब उमड़ रहा है और रातभर विशेष पूजा-अनुष्ठान के बीच तारापीठ में आस्था और साधना का संगम देखने को मिलेगा।




