आशिंक फटा नोट लेने से बस कंडक्टर का इंकार

विशेष संवाददाता
नई दिल्ली। कंेद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने साल 2016 में नोटबंदी किया था। नोटबंदी के पीछे जो करण रहा हो और उसमें कितनी सफलता मिली, यह सरकार जाने। लेकिन नए नोट के रुप में जो करेंसी आई उसमें कितना टिकाउपन है कि नई करेंसी का दम निकल गया है। कागज अत्यंत घटिया है और करेंसी को सरकारी महकमों और आम लोग थोड़ा भी गंदा और फटा होने पर लेन-देन से इंकार कर देते हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी एक रुपया के सिक्के प्रचलन में इसलिए नहीं हैं कि लोगबाग लेन-देन नहीं करते हैं। नोट गंदा इसलिए हो जाता है कि उसे कई हाथों से गुजरना पड़ता है। सवाल यह है कि करेंसी के गंदा या आशिंक फटा होने से उसका मूल्य क्या कम हो जाता है। गंदा या आशिंक फटा नोट लेन-देन में कभी-कभी झगड़ा का रुप ले लेता है। एक ऐसा ही मामला शुक्रवार को दिल्ली परिवहन निगम की बस के कंडक्टर के सौ की करेंसी जो आंशिक फटा था, लेने से इंकार कर देने पर सामने आया। पूर्वी विनोद नगर डिपो की बस डीएल 1 पीडी 7662 के कंडक्टर द्वारा सामने आया। बस रुट-डी 359 जो कल्याणपुरी से शिवाजी स्टेडियम जाती है। करेंसी न गंदा था और न ही फटा-चिटा, लेकिन कंडक्टर ने लेने से साफ इंकार दिया।

यात्री को उस नोट के अलावा दूसरा नोट नहीं था। यात्री विवश था, उसे रोजी-रोटी के लिए समय पर ऑफिस पहंुचा भी था। उसी बस में सफर कर रहे यात्रियों ने भी कहा कि नोट सही है, पर कंडक्टर मानने को तैयार नहीं था। कंडक्टर अक्खड़ स्वभाव का था। अन्ततः एक भद्र महिला ने अपने पर्स से एक साफ-सुथड़ा नोट दिया तब जाकर कंडक्टर ने टिकट दिया।
यात्री का कहना था कि सरकार को कम से कम सरकारी विभाग, जहां करेंसी का लेन-देन होता है वहां के कर्मचारी को स्पष्ट निर्देश होना चाहिए कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी नोट का सम्मान करे। ऐसा नहीं करने पर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।

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