सिनेमा और सत्ता का खेल

ख़ास रिपोर्ट
अजित चौबे

क्या भारतीय लोकतंत्र एक फिल्मी कहानी बनता जा रहा है?जिस तरह से फिल्मी कलाकारों को राजनीति में उतारा जा रहा है, उससे अपने लोकतंत्र का कितना भला हो रहा है? असल में हल्की राजनीति में हम भीड़ और वोट जुटाने के लिए जहां बाहुबल को कोसते हैं, तो सितारों की भागीदारी को भी उसी दर्जे में रखा जा सकता है।

राजनीति में फिल्मी कलाकारों का अब पूरा जोर चल रहा है।
हमारे देश में राजनीति और इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का बड़ा पुराना संबंध है. ऐसे कई एक्टर्स हैं, जिन्होंने पॉलिटिक्स को बतौर दूसरे करियर के रूप में शुरू किया और कामयाब भी रहे, पर बहुत से ऐसे भी रहे, जिन्हें राजनीति रास नहीं आई
बालीवुड का ग्लैमर राजनीति के मैदान में भी खूब चल रहा है। लोग अपने प्रिय कलाकारों को लोकसभा-विधानसभाओं में भेजते रहे हैं। अब भी कई फिल्मी एक्ट्रेसेज राजनीति में हैं। बॉलीवुड की ये ग्लैमरस राजनीति में भी कमाल कर रही है।

वैसे राजनेता जो कभी थे सिल्वर-सक्रीन के सितारे लेकिन जिन्होंने राजनीति के आकश में न केवल अपनी चमक बिखेरी बल्कि अपनी राजनीतिक सोच-समझ और कामयाबी से देश की राजनीति में स्थापित हुए।

बॉलीवुड की फिल्में पहले जहां सत्ता से सवाल करती थीं, सत्ता के बरक्स जनता के हक में खड़ी होती थीं, आज सत्ता के हक और हित में उसके लिए प्रचार का जरिया बनती नजर आ रही हैं।
भोजपुरी फिल्में और भोजपुरी सितारे दिन-ब-दिन नया मुकाम हासिल कर रहे हैं। उनकी फिल्मों को दर्शकों का खूब प्यार मिलता है। साथ ही भोजपुरी स्टार्स को देश-दुनिया में पहचाना जा रहा है। कई भोजपुरी सितारे बॉलीवुड की फिल्मों में भी अपनी दमदार अदाकारी का जलवा बिखेर चुके हैं। इतना ही नहीं, कुछ सितारे अभिनय की दुनिया के साथ साथ राजनीति में भी अपना दमखम दिखा रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि कला का यह माध्यम सत्ता की राजनीति के लिए विज्ञापन की भूमिका में आने के बाद क्या अपनी अहमियत को पहले जैसा बनाए रख सकेगा!

दरअसल, एक लोकप्रिय माध्यम के रूप में सिनेमा का जैसा विस्तार हुआ है, लोगों तक इसकी पहुंच बढ़ी है, राजनीति की दुनिया और खासतौर पर सत्ता ने इसका औजार के रूप में इस्तेमाल भी शुरू कर दिया।
कई बड़े स्टार्स हैं, जिन्होंने लंबी राजनीतिक पारियां खेली हैं.
चमकना सितारों की फितरत है। फलक चाहे जो हो, चमक बिखेरना उनका काम है। सिनेमा हो या राजनीति, सपने दोनों में दिखाए जाते हैं। जनता सब जानती है। लेकिन सपने देखना जनता की फितरत है। यही वजह है कि अभिनेता जब नेता बनता है तो जीत की गारंटी मानो पक्की हो जाती है। पार्टियां इसीलिए अभिनेताओं को आजमाती हैं।

प्रश्न यह उठता है कि किस तरह ये फिल्मी कलाकार हमारे मुद्दों और हमारा प्रतिनिधित्व कर पाएंगे। इनकी सामाजिक, आर्थिक सोच कितनी गंभीर हो सकती है
फिल्मी हस्तियों का राजनीति में प्रवेश किस हद तक ठीक है, यह एक बड़ी बहस का मुद्दा है, क्योंकि इनकी भागीदारी भीड़ व वोट दोनों जुटा तो लेती है

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