गंदी चीज–डायपर के बीच तैरती भगवान की माला! नाले में तब्दील होती नदी,
*विषय रिपोर्ट*

खामोश प्रशासन—महिषमारी नदी को बचाने में उतरा सिलीगुड़ी का युवा समाज
अजित प्रसाद, सिलीगुड़ी : नदियों को प्रदूषित करना मानो आज समाज का सामान्य अधिकार बन गया है। देशभर में लगातार बढ़ती प्रदूषित नदियों की संख्या इसका जीता-जागता उदाहरण है। सिलीगुड़ी शहर भी इस भयावह सच्चाई से अछूता नहीं है। कभी जीवनदायिनी रही महानंदा नदी आज कई इलाकों में प्रदूषण के बोझ तले कराह रही है। इसी महानंदा में आकर मिलती है सिलीगुड़ी नगर निगम के 46 नंबर वार्ड की महिषमारी नदी, जो कभी लोगों के पीने के पानी का सहारा थी, लेकिन आज वह लगभग एक नाले में तब्दील हो चुकी है।

आकार में छोटी होने के बावजूद महानंदा में मिलकर महिषमारी नदी एक विस्तृत स्वरूप लेती है। मगर आज उसका यह स्वरूप कचरे के ढेर से ढका हुआ है। नदी में दिन-प्रतिदिन जमा हो रहे हैं प्लास्टिक, डायपर, और घरेलू कचरे के ढेर। जिन पर सफाई और निगरानी की जिम्मेदारी है, वही प्रशासन पूरी तरह मौन दिखाई दे रहा है। इसी प्रशासनिक चुप्पी के खिलाफ आवाज उठाने के लिए आगे आया है सिलीगुड़ी का जागरूक युवा समाज।
रविवार की सुबह से ही सिलीगुड़ी के 46 नंबर वार्ड स्थित महिषमारी नदी के तट पर हलचल देखने को मिली। करीब 60 युवक-युवतियां खुद नदी में उतरकर सफाई अभियान में जुट गए। युवाओं का कहना है कि वे यह पहल भविष्य की पीढ़ी को ध्यान में रखकर कर रहे हैं। उनका मानना है कि जिस तरह आज नदियों और जलस्रोतों को नष्ट किया जा रहा है, उससे आने वाला कल बेहद अंधकारमय होगा। इसलिए वे हर रविवार सिलीगुड़ी की अलग-अलग नदियों में सफाई कार्य करते हैं, भले ही उन्हें पता है कि कुछ ही दिनों में फिर वही हाल हो जाएगा।
यह अभियान मुख्य रूप से ‘द ब्लाइंड ऑफ होप’ नामक युवाओं के संगठन की पहल पर चलाया जा रहा है। इस अभियान में सिलीगुड़ी सेल्सन कॉलेज की एनएसएस यूनिट सहित कई स्वयंसेवी संगठनों ने सहयोग किया। संगठन के अध्यक्ष सुमन राय ने कहा, “नदी की हालत देखकर दिल रो पड़ता है। जिस तरह प्रदूषण बढ़ रहा है, उसमें हम भविष्य की पीढ़ी के लिए कुछ भी नहीं बचा रहे। कभी यह महिषमारी नदी कितनी सुंदर थी, और आज नाले में बदल गई है।”
सफाई के दौरान युवाओं को कड़वे अनुभवों का भी सामना करना पड़ा। सुमन राय ने बताया कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने एक महिला को पुल से भगवान की माला, फूल और पूजा-सामग्री नदी में फेंकते देखा। विरोध करने के बावजूद महिला ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। उस वक्त नदी में एक तरफ गंदी चीज, डायपर और गंदा कचरा तैर रहा था, तो दूसरी तरफ देवी-देवताओं की तस्वीरें और पूजा-सामग्री—जो एक भयावह तस्वीर पेश कर रहा था।
इस दिन नदी से करीब सौ से अधिक बोरियां कचरा निकाला गया। उन बोरियों में एक साथ मिले डायपर, गंदा प्लास्टिक और भगवान की तस्वीरें व पूजा-सामग्री। यह दृश्य न सिर्फ पर्यावरण प्रदूषण की गंभीरता को दर्शाता है, बल्कि सामाजिक सोच और मानवीय मूल्यों पर भी गहरा सवाल खड़ा करता है। बिना सोचे-समझे नदी में सब कुछ फेंक देने की यह प्रवृत्ति जहां नदियों को मौत की ओर धकेल रही है, वहीं समाज की संवेदनशीलता को भी कठघरे में खड़ा कर रही है।




