नयी दिल्ली की लेखिका वनिता शर्मा का राजीव कुमार झा के द्वारा किया गया साक्षात्कार…

साहित्य: साक्षात्कार

“हिंदी और संस्कृत – मां और बेटी का रिश्ता”

हिंदी-संस्कृत, रीतिकालीन काव्य, बोलियों के भविष्य और कविता के तत्वों पर सार्थक बातचीत।

प्रश्न – आप देश में हिंदी और संस्कृत की जानी – मानी शिक्षिका हैं। सारे देश में हिंदी और संस्कृत शिक्षण की जरूरत किस रूप में महसूस करती हैं? इस बारे में अपने विचारों से अवगत कराएं।

उत्तर--जी हाँ आदरणीय, मैं हिंदी और संस्कृति की शिक्षिका रही हूँ और मैंने कई वर्षों तक इसका अध्ययन और अध्यापन किया है और अपनी गौरवमयी प्राचीनतम भाषा संस्कृत और हिंंदी भाषा का गहन अध्ययन किया है। छात्र-छात्राओं को भी प्राचीनतम समृद्ध और गौरवशाली भाषा संस्कृत तथा आदर्श ,संस्कारों, और संवाद की भाषा हिंदी का भी पाठ पढ़ाया।
वर्तमान वैश्वीकरण, तकनीकी विकास और बदलती जीवनशैली के दौर में हिंदी और संस्कृत दोनों भाषाओं का महत्व और आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। ये केवल भाषाएँ ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, ज्ञान और सभ्यता की संवाहक हैं।
वैज्ञानिक एवं तार्किक भाषा संस्कृत की व्याकरणिक संरचना अत्यंत व्यवस्थित और वैज्ञानिक मानी जाती है। भाषा-विज्ञान और कंप्यूटर विज्ञान के क्षेत्र में भी इसकी उपयोगिता स्वीकार की गई है। संस्कृति और मूल्यों का संरक्षण, संस्कृत भारतीय संस्कृति, नैतिकता, आध्यात्मिकता और जीवन-दर्शन की वाहक है। यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती है।
योग, आयुर्वेद और दर्शन का वैश्विक प्रसार आज विश्वभर में योग और आयुर्वेद के प्रति बढ़ती रुचि के कारण संस्कृत के अध्ययन की आवश्यकता भी बढ़ रही है।

राष्ट्रीय एकता का माध्यम हिंदी भाषा भारत के विभिन्न राज्यों और भाषाई समुदायों के बीच संवाद स्थापित करने का सशक्त माध्यम है। यह राष्ट्रीय एकता और भावनात्मक समरसता को मजबूत करती है।
ज्ञान-विज्ञान की भाषा शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता, सिनेमा, डिजिटल मीडिया और प्रशासन में हिंदी का व्यापक उपयोग हो रहा है। नई शिक्षा नीति में भी मातृभाषा एवं भारतीय भाषाओं के महत्व पर बल दिया गया है। वैश्विक पहचान हिंदी विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है। अनेक देशों में हिंदी का अध्ययन और अध्यापन किया जा रहा है, जिससे भारत की सांस्कृतिक पहचान सुदृढ़ हो रही है।

वस्तुत:हिंदी और संस्कृत केवल भाषा ही नहीं बल्कि भारतीय अस्मिता सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान संपदा की आधारशिला है। दोनों ही भाषाओं का मानव जीवन में अत्यंत महत्व है। हिंदी भाषा आदर्श और संस्कारों की भाषा है जो हमें जड़ों से जोड़े रखती है तो संस्कृत हमें आदि संंस्कृृति ,सभ्यता,भारतीय ज्ञान परम्परा के आधार वेद,पुराण, उपनिषद,रामायण, महाभारत, योग दर्शन जैसे अमूल्य धर्म ग्रंथ ,जो अधिकतर संस्कृत में रचे गए है,उनसे भी परिचित कराती है । अगर यूं कहें कि दोनों ही भाषाओं का परस्पर मां- बेटी जैसा संबंध है,तो अन्योक्ति न होगी। जैसे बेटी को माँ के सभी गुण विरासत में ही मिल जाते हैं वैसे ही हिंदी भाषा को भी संस्कृत की सभी विधाएं, काव्य सौंदर्य, शिल्प सौंदर्य, व्याकरण शैली ,शब्दावली और सांस्कृतिक चेतना आदि विरासत में ही प्राप्त हैं।
हिंदी और संस्कृत का समन्वित अध्ययन भारतीय भाषाई विरासत को सुदृढ़ करता है तथा ज्ञान के नए आयाम खोलता है।
हाँ, परिस्थितियों और समयानुसार उसके मानकों में परिवर्तन अवश्य आया है।
वर्तमान समय में हिंदी और संस्कृत केवल भाषाएँ नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता, सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान-संपदा की आधारशिला हैं। हिंदी हमें वर्तमान से जोड़ती है, जबकि संस्कृत हमें हमारी गौरवशाली परंपरा से परिचित कराती है। अतः आधुनिकता और परंपरा के संतुलन हेतु दोनों भाषाओं का संरक्षण, संवर्धन और व्यापक उपयोग अत्यंत आवश्यक है।

प्रश्न – आपने रीतिकालीन कृष्णकाव्य विषय पर शोध किया है। कृष्ण काव्य परंपरा के विकास के साथ हिंदी काव्य में अंतर्वस्तु के धरातल पर किन नये विषयों पर लेखन की शुरुआत हुई। इस बारे में जानकारी दीजिए।

उत्तर–जी- मेरे शोध का विषय है- “रीतिकालीन कृष्ण काव्य में लोक संस्कृति” रीतिकालीन कृष्णभक्ति काव्य वह दौर है, जहाँ कृष्ण का चरित्र भक्ति की पावन परिधि से निकलकर दरबारी और श्रृंगारिक परिवेश में ढल गया। इस काल में राधा-कृष्ण को लौकिक नायक-नायिका के रूप में चित्रित किया गया और ब्रजभाषा का अत्यंत अलंकृत, सुकुमार और संगीतमय प्रयोग हुआ।
कृष्ण भारतीय जनमानस के अत्यंत निकट रहे हैं उनका व्यक्तित्व बहु आयामी है। वह बालक है, सखा है, प्रेमी है ,नायक है, और दार्शनिक है और लोकनायक पूर्णपुरुष भी। अतः कृष्ण काव्य कवियों के लेखन का व्यापक संसार सहज रूप से समाहित हुआ है ।मुख्यतः काव्य शास्त्री सिद्धांतों,अलंकारों, रसो तथा श्रृंगारी अभिव्यक्तियों से युक्त काव्यधारा का विशिष्ट रूप प्रदान किया है । वास्तव में रीतिकालीन कृष्ण काव्य भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का पूर्ण दस्तावेज है। रीतिकालीन कृष्ण काव्य में भक्ति की अपेक्षा सौंदर्य, प्रेम, श्रृंगार, अलंकार और काव्य-कला का विकास प्रमुख रूप से हुआ। इस युग की नई लेखन-धारा ने कृष्ण को भक्तों के आराध्य से अधिक रसिक नायक के रूप में स्थापित किया तथा हिंदी काव्य को कलात्मक ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। यह प्रवृत्ति रीतिकालीन साहित्य की विशिष्ट पहचान बन गई।

रीतिकालीन कृष्ण काव्य में भक्ति परंपरा का प्रभाव तो विद्यमान रहा, किंतु इसके साथ अनेक नई प्रवृत्तियाँ और लेखन-धाराएँ भी विकसित हुईं। भक्तिकाल के कृष्ण जहाँ लोकमंगल और आध्यात्मिक प्रेम के प्रतीक थे, वहीं रीतिकाल में वे मुख्यतः श्रृंगार, सौंदर्य और नायिका-भेद के आलंबन बन गए।
आज समाज तनाव, भौतिकता और सांस्कृतिक विघटन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में रीतिकालीन कृष्ण साहित्य प्रेम, सौंदर्य, संवेदना, मानवीय संबंधों और सांस्कृतिक चेतना का संदेश देता है। साथ ही, आधुनिक आलोचना इसकी सीमाओं—जैसे अत्यधिक दरबारी प्रभाव और श्रृंगार-प्रधानता—पर भी विचार करती है। इसलिए इसका अध्ययन संतुलित और समालोचनात्मक दृष्टि से किया जाना चाहिए।

प्रश्न – आजादी के बाद राजभाषा के तौर पर हिंदी खड़ी बोली का खूब विकास हुआ लेकिन इसकी बोलियों में साहित्य लेखन की परंपरा कमजोर होती चली गई। इसके क्या कारण हैं?

उत्तर – नहीं,ऐसा नहीं है, यह मानना कि खड़ी बोली के विकास के साथ अन्य बोलियों का पूर्णतः हनन हुआ है ,अनुचित है, हाँ ,उनका सार्वजनिक, शैक्षिक और प्रशासनिक प्रयोग अपेक्षाकृत कम अवश्य हुआ। इसके पीछे कई ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं। आधुनिक युग में शिक्षा, प्रशासन, पत्रकारिता और साहित्य के लिए एक मानक भाषा की आवश्यकता थी। खड़ी बोली को सरल, व्यापक और व्यावहारिक मानकर हिंदी का मानक रूप स्वीकार किया गया। इससे अन्य बोलियाँ जैसे ब्रज, अवधी, बुंदेली, बघेली, मैथिली, भोजपुरी आदि पीछे छूटती चली गईं। परंतु उनका महत्त्व कम नहीं है। आज भी अन्य बोलियों मैं खूब साहित्य सृजन हो रहा है । उनका अपना लोक साहित्य है, लोक संस्कृति है, जिसमें वह भरपूर आनंद ले रहे हैं । संविधान में भी हिंदी खड़ी बोली के अतिरिक्त अन्य बोलियों को भी सम्मान दिया गया है

कई बार खड़ी बोली को “शिक्षित” और “मानक” भाषा माना गया, जबकि बोलियों को केवल घरेलू या ग्रामीण भाषा समझा गया। इस मानसिकता ने अन्य बोलियों के प्रयोग को प्रभावित किया। यह कहना कि खड़ी बोली के विकास के कारण अन्य बोलियों का ह्रास हुआ है, या बोलियों का विनाश हो गया, उचित नहीं होगा । आज भी ब्रजभाषा में काव्य और भक्ति साहित्य रचा जा रहा है।
अवधी लोकगीतों और साहित्य में यह काव्य परंपरा आज भी जीवित है। भोजपुरी का अपना विशाल साहित्य और फिल्म उद्योग है। मैथिली को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। अन्य क्षेत्रों की बोलियाँ भी अपने आप में समृद्ध है।

सच तो यह है कि खड़ी बोली का विकास राष्ट्रीय और प्रशासनिक आवश्यकता का परिणाम था, परंतु इसके कारण अनेक क्षेत्रीय बोलियाँ अपेक्षाकृत उपेक्षित हुईं, कहना अनुचित होगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि मानक हिंदी के साथ-साथ क्षेत्रीय बोलियों का भी संरक्षण, संवर्धन और साहित्यिक विकास किया जाए, क्योंकि ये भारतीय लोक संस्कृति और भाषाई विविधता की अमूल्य धरोहर हैं।

प्रश्न – आप अपने कविता लेखन के बारे में बताइए। कविता रचना में किन तत्वों की भूमिका को जरूरी मानती हैं।

उत्तर – कविता मानव की संवेदनाओं, अनुभूतियों और कल्पनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति है। यह केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि भाव, विचार और कला का समन्वित रूप है। अंतर्मन की गहराइयों से निकली अनुभूतियां जब सौंदर्य संवेदना और विचित्रता पर मुग्ध होकर शब्दों के माध्यम से साकार होती है, तब कविता का जन्म होता है । वास्तव में अनुभूति से अनुभूति का विधान ही कविता है।
कविता लेखन की रुचि तो मुझे बचपन से ही थी। कविताएं लिखती थी पर कभी सहेज के नहीं रखीं। मुझे अपने पिता जी इसकी बहुुत प्रेरणा मिलती थी। वे मेरे प्रेरक थे। कविता लेखन की कला तो मुझे उन्हीं से विरासत में मिली है। करोना काल में तो नित्य प्रति कविताएँ लिखने की रुचि बलवती हो गई। मैंने छंंदबद्ध और छंद मुक्त कविताएँ लिखी है। दोनों ही विधाओं में मेरी लेखनी धारा प्रवाह चलती है। मेरी संंदेेशपरक सैकड़ों कविताएँ देख कर मेरे पतिदेव ने इन्हें प्रकाशित कराने की सलाह दी और उनके सहयोग से ही मेरा पहला काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ।
आज मेरे पाँच काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं तथा शेष प्रकाशनाधीन हैं । अनेकों पत्र – पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं और पुरस्कृत भी।

आप जानना चाहते हैं कि कविता लेखन के प्रमुख तत्व क्या हैं तो
मेरा मानना है कि ” कविता का प्राण भाव है। ”
कविता लेखन में प्रमुख तत्व
भाव होता है जो कविता को जीवंत रखता है।
उद्देश्यपूर्ण चिंतन और जीवन-दृष्टि का समावेश के लिए विचार और कल्पना चाहिए।
विचार कविता को गहराई और सार्थकता प्रदान करते हैं तो
कल्पना साधारण अनुभवों को असाधारण सौंदर्य प्रदान करती है।
कवि अपनी कल्पना के माध्यम से नवीन संसार का सृजन करता है।
सरल, प्रभावपूर्ण और भावानुकूल भाषा कविता की आत्मा है और
शैली कवि की विशिष्ट पहचान बनाती है। कविता में शिल्प सौंदर्य के उत्तम प्रयोग से पाठकों के हृदय को आनंदानुभूति होती है।रस,छंद,लय,अलंकार आदि कविता के सौंदर्य को बढ़ाते हैं तथा कविता को संगीतात्मक रूप से श्रवणीय एवं स्मरणीय बना देते हैं। इन तत्वों के बिना कविता निष्प्राण होती है।
वास्तव में कविता साहित्य की वह कलात्मक विधा है, जिसमें भावनाओं, विचारों और कल्पना को गेय (लयबद्ध) या छंदोबद्ध शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। यह शब्दों का ऐसा सुंदर और प्रभावी संयोजन है, जो पाठक या श्रोता के मन में गहरी संवेदनाएं और सौंदर्यबोध जगाता है।

प्रश्न – वर्तमान समय में कविता लेखन में काव्य के परंपरागत तत्वों का पतन होता जा रहा है। इससे हिंदी कविता किस तरह से प्रभावित दिखाई देती है।

उत्तर – कविता केवल भावों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि कला का अनुशासित और सौंदर्यपूर्ण रूप है। आधुनिक कविता में विषय-विविधता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्वागतयोग्य है, किंतु शिल्प, छंद, लय, अलंकार और भाषिक सौंदर्य की उपेक्षा कविता की कलात्मक गरिमा को क्षीण कर रही है। इसलिए आवश्यक है कि आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित करते हुए कविता के भाव-पक्ष के साथ उसके शिल्प-सौंदर्य का भी संरक्षण किया जाए। यही कविता की स्थायी शक्ति और साहित्यिक महत्ता का आधार है।
बदलते परिवेश में तकनीकी प्रगति, सोशल मीडिया के प्रभाव और जीवन की भागदौड़ ने कविता के रूप, उद्देश्य और पठन-पाठन को काफी हद तक बदल दिया है।

प्रश्न:आपने नुक्कड़ नाटक लेखन भी किया है। नुक्कड़ नाटक लेखन का भी ह्रास होता जा रहा है।
नुक्कड़ नाटकों के महत्व को महत्व को रेखांकित कीजिए।

उत्तर: नुक्कड़ नाटक जनसंचार और जनजागरण का एक सशक्त माध्यम है। यह रंगमंच की ऐसी विधा है जो बिना किसी विशेष मंच, पर्दे या महंगे उपकरणों के सीधे जनता के बीच प्रस्तुत की जाती है। वर्तमान समय में नुक्कड़ नाटक सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक चेतना के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज भी नुक्कड़ नाटक अपनी प्रत्यक्ष संवाद शैली, सरल भाषा और जनसरोकारों के कारण अत्यंत प्रभावशाली हैं। जब किसी मुद्दे को आम जनता तक तुरंत और प्रभावी ढंग से पहुँचाना होता है, तब नुक्कड़ नाटक सबसे सशक्त माध्यमों में से एक सिद्ध होते है।

वर्तमान समय में डिजिटल क्रांति के बावजूद नुक्कड़ नाटकों की प्रासंगिकता बनी हुई है। वे समाज की नब्ज को पहचानकर जनता को जागरूक करने, संवाद स्थापित करने और सामाजिक परिवर्तन की चेतना जगाने का कार्य कर रहे हैं। यदि इन्हें पर्याप्त प्रोत्साहन, प्रशिक्षण और मंच उपलब्ध कराया जाए, तो यह विधा भविष्य में भी जनचेतना की एक प्रभावी धारा बनी रहेगी।
आवश्यकता है इन्हें आर्थिक संसाधनों और संस्थागत सहयोग उपलब्ध करवाना।

प्रश्न: आप इन दिनों कहां रहकर साहित्य सेवा में संलग्न हैं। आपके घर परिवार के बारे में बताइए।
उत्तर- जी, मैं दिल्ली में अपने परिवार के साथ रहती हूँ। मेरी जन्मस्थली कानपुर है और कर्म भूमि दिल्ली में हिंदी संस्कृत की शिक्षिका, लेखिका,कवयित्री और समाज सेविका हूँ। आजकल हिंदी के प्रचार-प्रसार और साहित्य साधना में संलग्न हूँ। मेरे परिवार में मेरे पति जो दिल्ली हाई कोर्ट से रजिस्टर के पद से सेवानिवृत्त हैं, पुत्र-पुत्रवधू, पुत्री- दामाद और उनके दो बच्चे है। सभी अपने-अपने कार्यों में संलग्न है। अपनी भाषा की सेवा, संरक्षण और संवर्धन के प्रति मैं पूर्ण रूप से समर्पित हूँ।

जय भारती!

धन्यवाद

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