प्रयागराज की कवयित्री पुष्पा साहू से राजीव कुमार झा की बातचीत…

साहित्य : साक्षात्कार

 

 

प्रश्न 1: कवयित्री को शब्दों की साधिका, भावों की चित्रकार कहा जाता है। इस बारे में अपने विचार
उत्तर: कवयित्री सचमुच शब्दों की साधिका है, क्योंकि वह एक-एक शब्द को तपस्या की तरह चुनती है। शब्द उसके लिए सिर्फ अक्षर नहीं, जीवित स्पंदन होते हैं। और भावों की चित्रकार इसलिए कि जहाँ ब्रश रंगों से चित्र बनाता है, वहाँ कवयित्री शब्दों से मन के भीतर दृश्य उकेर देती है। मेरा मानना है कि कविता वो तस्वीर है जिसे आँखें नहीं, दिल पढ़ता है। कविता की सबसे बड़ी ताक़त है – अनकहे को कह देना, अनदेखे को दिखा देना।

प्रश्न 2: अपने माता-पिता से आपको जीवन का क्या संस्कार मिला?
उत्तर: माता-पिता से मिला सबसे बड़ा संस्कार है – “हालात कैसे भी हों, इंसानियत मत छोड़ना”। पापा ने सिखाया कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता और हार मानना कायरता है। माँ ने सिखाया कि सब्र से बड़े से बड़ा ज़ख्म भी भरा जा सकता है।
उन्हीं से सीखा है कि सच बोलने का साहस सबसे बड़ा गहना है। आज मेरी कलम में जो ईमानदारी है, वो उन्हीं के दिए संस्कारों की देन है।

प्रश्न 3: लेखन और चित्रकला में आपकी रुचि है। इन दोनों माध्यमों के बीच के रिश्तों के बारे में जानकारी दीजिए
उत्तर: लेखन और चित्रकला दोनों भावनाओं की भाषा हैं, बस लिपि अलग है। जहाँ चित्रकला रंग और रेखाओं से बोलती है, वहीं लेखन शब्दों से। मेरे लिए दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। कई बार कोई दृश्य देखकर मन में कविता जन्म लेती है, और कई बार कविता लिखते हुए आँखों के सामने पूरा चित्र बन जाता है। कविता मन का चित्र है और चित्र कैनवास की कविता। दोनों का मकसद एक ही है – जो दिल में है उसे दुनिया के सामने लाना, बिना बोले सब कुछ कह देना।

प्रश्न 4: आप वर्षों से प्रयागराज में निवासरत हैं। इस ऐतिहासिक धार्मिक शहर के वातावरण-परिवेश के बारे में बताइए
उत्तर: प्रयागराज सिर्फ शहर नहीं, एक जीवित अनुभव है। यहाँ गंगा-यमुना का संगम सिर्फ नदियों का नहीं, संस्कृतियों, आस्थाओं और इतिहास का भी संगम है। सुबह मंदिरों की घंटियों में, तो शाम संगम के किनारे दीपों और कवियों की महफ़िलों में ढलती है। यहाँ की हवा में तुलसीदास की चौपाइयाँ हैं, तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय की दीवारों में निराला और महादेवी वर्मा की गूँज।
यह शहर एक साथ धार्मिक भी है और क्रांतिकारी भी। यहाँ का वातावरण एक लेखक को हर दिन कुछ नया सोचने, लिखने को मजबूर करता है। यहाँ शांति भी है और हलचल भी – बिल्कुल गंगा की लहरों की तरह।

प्रश्न 5: आपने किन विधाओं में लेखन किया है। अपने साहित्य सृजन के बारे में जानकारी दीजिए
उत्तर: मैंने मुख्य रूप से कविता, ग़ज़ल, नज़्म, कहानी, लेख, मुक्तक, भजन जैसी विधाओं में लेखन किया है। मैंने इन 28 वर्षों में बहुत सी रचनाओं का सृजन किया है। मेरी रचनाओं का केंद्र ‘स्त्री मन के भाव ‘, ‘टूटकर फिर उठने का हौसला’ और ‘रिश्तों की उलझनें’ रही हैं। मेरी रचनाओं में कृष्ण के प्रति भक्ति और अनुराग की झलक मिलती है।
मैं ‘मीरा’ तख़ल्लुस से लिखती हूँ। मेरी कोशिश रहती है कि भाषा सरल हो पर बात गहरी हो। चाहती हूँ कि मेरी कविता पढ़कर कोई अकेला व्यक्ति ये महसूस करे कि “ये तो मेरे दिल की बात है”। लेखन मेरे लिए सिर्फ लेखन नहीं बल्कि मेरी तपस्या, मेरी साधना है।

साक्षात्कारकर्ता: राजीव कुमार झा
स्थान: इंदुपुर, बड़हिया, लखीसराय, बिहार

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