मुझको मोहब्बतों का ……
मुझको मोहब्बतों का तजुर्बा नहीं रहा
शायद इसी वजह से मैं तुम सा नहीं रहा
बोले गये हैं झूट बड़े ऐतबार से
बातों पे अब किसी के भरोसा नहीं रहा
मुझको तमाम उम्र यही बेकली रही
सबका हबीब कैसे किसी का नहीं रहा
माना कि हम हुए थे तुम्हारे मुरीद पर
वो ताव जो था पहले तुम्हारा नहीं रहा
गिरना पड़ा ज़मीं पे बिखरना पड़ा उसे
बादल का आसमां पे ठिकाना नहीं रहा
…………….
डाॅ. सोमनाथ शुक्ल
प्रयागराज



