बेंगलूरू की लेखिका डॉ इंदु झुनझुनवाला जैन से राजीव कुमार झा की बातचीत…
साहित्य: साक्षात्कार
प्रश्न – 1.आप जैन धर्म की विदुषी हैं। जैन ग्रंथों में प्रतिपादित जीवन दर्शन की मूल बातों से बेहद संक्षेप में अवगत कराएं।
उत्तर – जैन धर्म वास्तव में किसी एक समुदाय द्वारा पालन किए जाने वाली बाह्य क्रियाएँ मात्र नहीं।
यह कोई सम्प्रदाय भी नहीं, यह तो मानवता का धर्म है, मानव मात्र के लिए जीवन के साथ -साथ मृत्यु की और मोक्ष की भी कला सिखानेवाला धर्म है, जो धर्म अनेकान्तवाद के सिद्धान्त द्वारा, निश्चय नय एवम् व्यवहार नय के द्वारा, स्यातवाद के द्वारा विचारों के प्रगटीकरण का वह दर्शन है, जिसे चरित्र में घटित कर सभी संघर्षों से परे शान्ति एवम् सुख से सामाजिक जीवन जिया जा सकता है।
आज इसके बारे में इतनी अधिक भ्रांतियाँ फैल गई हैं कि सत्य कोसों दूर हो गया है, कहीं इसे त्याग का धर्म बताते हुए सिर्फ संन्यास तक सीमित कर दिया गया है, तो कहीं बाह्य कर्मकांडों में उलझकर आडम्बरों में फँसकर बस प्रदर्शन मात्र मान लिया गया है, जहाँ व्रत भी प्रदर्शन एवम् अहंकार के पोषण मात्र में सहायक होने लगे हैं। इसका कारण सम्प्रदायों की अनगिनत श्रेणियाँ भी हैं – समस्या यह है कि हर श्रेणी अनेकान्तवाद को धूल-धूसरित करते हुए स्वयं को ही श्रेष्ठ और सही मानती है, अफसोस है कि यह जैन दर्शन नहीं है, यह महावीर का धर्म नहीं है।
तीर्थंकर का धर्म दर्शन हर मानव मात्र के लिए है, जो सुख और शान्ति चाहता है। यह धर्म उसके लिए भी मार्ग प्रशस्त करता है, जो निश्चय के मार्ग को समझते हुए कैवल्य की ओर बढना चाहते हैं और उनके लिए भी मार्ग बनाता है, जो परिवार एवम् समाज में रहते हुए शान्ति और प्रेम का जीवन जीना चाहते हैं।
अब बात ग्रंथों में प्रतिपादित जीवन दर्शन की।
जैन दर्शन का फलक सम्पूर्ण धरा भी है और विस्तृत आकाश भी, स्वर्ग भी है और नरक भी। तीर्थंकर महावीर की दिव्य वाणी से प्राप्त ज्ञान को जिन ग्रंथों में संग्रहित किया गया, वे आगम ग्रंथ कहलाए।
उनमें अलग-अलग विषयों पर प्राकृत भाषा में रचे गए ग्रंथो का समय-समय पर अनुवाद, व्याख्याएँ , टीकाएँ आदि रची गई हैं जो कि अत्यंत विस्तारित हैं और आज भी रची जा रही हैं।
जैन दर्शन के मुख्य बिन्दु-
आत्मा ( जीव तत्व) – निश्चय नय की दृष्टि से चैतन्य, शाश्वत, शुद्ध-बुद्ध आत्मा अर्थात् ज्ञान-केवल ज्ञान- ज्ञाता-द्रष्टा मात्र।
देह ( अजीव तत्व) -पुद्गल, नष्ट होने वाले, परिवर्तन होने वाला, बनने बिगड़ने वाला।
सांसारिक आत्मा ( जीव) – देह धारण करने पर, देह को ही अपना मानती, देह भाव में जीती, पर को स्व समझती कर्मों के बंध से भवों-भवों के चक्र में जन्म-मरण के क्षणिक सुख-दुःख को भोगती।
स्व व पर के भेद को नहीं समझते हुए, सभी जीव में आत्मतत्व को नहीं जानते हुए, कषायों ( लोभ , मान, क्रोध, मोह आदि) राग द्वेष के कारण,संयम एवम् समानता के सत्य से दूर, अनगिनत इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाने के कारण संघर्षरत जीवन को जीती है।
जैन दर्शन इस सत्य से परिचित कराने की यात्रा का नाम है, जहाँ उपवास करना भोजन त्यागने का नाम नहीं, स्वयं में लीन हो जाने का नाम है, उन क्षणों में भोजन का त्याग नहीं करना होता, स्वयं हो जाता है।
पाँच व्रत- जिसमें त्याग नहीं, ग्रहण मात्र है- अहिंसा का ग्रहण, सत्य का ग्रहण, अचौर्य का ग्रहण, अपरिग्रह का ग्रहण, अब्रह्मचर्य का ग्रहण।
यहाँ व्रत का अर्थ संकल्प है, जहाँ आत्मा उन गुणों का ग्रहण पुनः करती हैं, या उन गुणों हें पुनः स्थिर होती है, जो संसार के कारण विस्मृत हो गए थे।
विशेष बात यह भी है कि इनमें से किसी भी एक व्रत का संकल्प स्वयं ही बाकी व्रतों को भी स्वमेव ही पूरा कर देता है।
इनमें ध्यान चिन्तन की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसमें स्वाध्याय, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान विशेष भूमिका निभाते हैं।
इसके साथ अनेकान्तवाद का मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त और उसका चारित्रिक प्रयोग।
जीव एवम् अजीव को लेकर सात या नौ तत्वों द्वारा जीव की यात्रा- जीव, अजीव, आस्त्रव, बंध,पाप, पुण्य, संवर, निर्जरा एवम् मोक्ष।
सृष्टि की संरचना, तीन लोकों का विस्तार एवम् षट्द्रव्य एवम् पंचास्तिकाय- जीवास्तिकाय, अजीवास्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशस्तिकाय एवम् छठा द्रव्य काल ।
एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय जीवों के बारे में विस्तारित सूक्ष्म वैज्ञानिक ज्ञान।
पृथ्वीकायिक, जलकायिक, वायुकायिक, अग्निकायिक, वनस्पतिकायिक आदि सूक्ष्म जीवों का ज्ञान।
निष्कर्षतः आज से करीब पौने तीन हजार साल पहले सर्वज्ञ महावीर द्वारा जो विज्ञान मानव कल्याण के लिए प्रस्तुत किया गया था, वह आधुनिक विज्ञान को चमत्कृत करनेवाला भी है और विज्ञान को और अधिक शोध के लिए प्रेरित करने वाला भी।
जैन ग्रंथों में प्रतिपादित दर्शन सम्पूर्ण लोकों के अणु-अणु का वैज्ञानिक दर्शन है, जो सिर्फ जिज्ञासाओं की पूर्ति मात्र नहीं करता, बल्कि परस्परोपजीवानाम् के साथ-साथ मानव जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की अनुपम राह के द्वार भी खोलता है।
प्रश्न -2. आप अपनी स्वरचित पुस्तकों के बारे बताइए।
इन पुस्तकों की रचना गद्य अथवा पद्य में आपने की है?
उत्तर –मेरी स्वरचित आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो अलग-अलग विधाओं पर हैं। मैं स्वतंत्र लेखन में विश्वास करती हूँ, मेरे लिए लेखन कोई कार्य नहीं, यह तो बहती नदी की धारा है, जहाँ ढलान मिला बह चली, जब बादल उमड़े, बरस पड़ी, जब हृदय पर आघात हुआ, लेखनी चल पड़ी, सारे छन्द बंध को तोड़कर,, बस बिना किसी ओर झांके-ताके, अबाध रूप से।
गद्य और पद्य – ये दोनों भी बुद्धि से अधिक हृदय का विषय ही रहे। कुछ जो लिखा गया स्वतः ही, उसे पाठकों पर ही छोड़ दिया, जिस भी विधा का नाम दें।
बचपन से लेखनी चलती रही,स्वांतः सुखाय ही चरितार्थ रहा। एक-दो पत्रिका में कुछ प्रकाशित भी हुई, मानदेय भी प्राप्त हुआ।
पी.एच- डी ( 2009 से 2013) के दौरान शोधपत्र भी छपे।
परन्तु 2016 में किसी ने आठ- दस कविताएँ माँगी साझा संकलन के लिए और तबसे आरम्भ हुआ प्रकाशन का सिलसिला भी, लोकार्पण और परिचर्चा भी।
अनुभूतियों के मोती – पहली काव्य पुस्तक – जिसमें बीस साल पहले की भी काव्य रचनाएँ हैं और बाद की भी।
बूँद का सफरनामा – काव्य संग्रह
समद समाना बूँद में – काव्य संग्रह
काव्या – लघु उपन्यास , जो वास्तव में डॉ मंजरी पाण्डेय जी की जीवन संधर्ष की गाथा है, जो वाराणसी की सुप्रसिद्ध कवयित्री, अभिनेत्री, साहित्कार एवम् समाजसेवी हैं। जिसे बहुत अधिक सफलता प्राप्त हुई और कुछ फिल्ममेकर उस पर फिल्म भी बनाना चाहते हैं।
बुद्ध यात्रा अन्तर की – बुद्ध की जीवन गाथा -एक नई विधा में, नए कलेवर के साथ, नए रूप में। जिसका मंचन वाराणसी के कलाकारों ने किया और अत्यंत सराहनीय रहा।
बूँद – बूँद जीवन – गद्ध और पद्य के साथ एक कथा तीन पीढ़ियों की- नारी विमर्श से सम्बन्धित।
आज की अहिल्या – कहानी संग्रह , इसमें स्त्री विमर्श ही है, सत्य कथाओं पर आधारित ये कहानियाँ, लघुकथा एवम् छोटी -बड़ी कहानियों में भी शायद रखी जा सकेंगी। भला शब्दों में क्या रखा है- आलेख, संस्मरण एवम् स्वानुभव से सम्बन्धित गद्य संग्रह।
प्रश्न – 3.अभ्युदय अंतराष्ट्रीय संस्था की आप अध्यक्ष हैं। इस संस्था के कार्यों से अवगत कराइए।
उत्तर – कोरोना काल में काव्य रंगोली (उत्तर प्रदेश-लखीमपुर- संस्थापक नीरज भाई) की संस्था पर प्रतिदिन के कार्यक्रम से प्रोत्साहन पाकर खोली गई एक संस्था, जिसका मुख्य उद्देश्य भारतीय साहित्य एवम् संस्कृति
के अभ्युत्थान के साथ उत्तर भारत एवम् दक्षिण भारत के बीच की लकीर को धुमिल करते हुए एक भारत के सपने को साकार करना है।
इसके साथ बढ़ती उम्र के साथ अकेलेपन को झेलते मानव को उसके भीतर छुपी कला को उभार कर उसके जीवन में कलारूपी रस का समावेश करना है।
आज की युवा पीढी को शिक्षा के साथ भारतीय संस्कृति का ज्ञान पाने के लिए प्रोत्साहित करना है, जिसका माध्यम भारतीय कलाओं के साथ भारतीय समृद्ध साहित्य है।
अंग्रेजी भाषा के बढ़ते हुए प्रचलन के कारण कहीं-न-कहीं हिन्दी एवम् अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य छूट रहा है, साहित्य ही वह माध्यम है, जो संस्कृति को आगे प्रेषित करने में सहायक होता है, अतः भारतीय भाषाओं एवम् साहित्य के प्रति प्रोत्साहन देने के लिए शिक्षाकेन्द्रों में प्रतियोगिताओं आदि कायर्क्रमों का करना।
शिक्षा एव मानव सेवा के क्षेत्र में जरूरतमन्द की सहायता करना आदि।
इस प्रकार एक संस्था एक महान स्वप्न को बूँ-बूँद प्रयासों से सफल करने की अथक कोशिश कर रही है।
निःशुल्क साझा संकलनों का प्रकाशन, शिक्षार्थियों के लिए फीस आदि सामग्री, ओल्ड ऐज होम में मदद आदि ।
इस संस्था ने विगत छः सालों में भारत ही नही, विश्व के देशों में भी अपनी एक पहचान बनाई है, इसकी पंद्रह शाखाएं भारत के राज्यों में, तीन विदेश मे और विधाओं एवम् कला पर आधारित पाँच समूह हैं।
सभी शाखाओं एवम् समूह के अध्यक्ष अपने – अपने राज्य या विषय से सम्बन्धित साहित्य एवम् संस्कृति को ऑनलाइन एवम् ऑफलाइन दोनों प्रकार से प्रस्तुत करते हैं। ऑन लाइन में सभी राज्यों के रचनाकार एवम् कलाकार जुड़ते हैं, जिससे सामाजिक एवम् सांस्कृतिक सौहार्द भी बढ़ता है और विशेष जानकारियाँ भी प्राप्त होती हैं। काव्य चौपाल के साथ पुस्तक लोकार्पण, साहित्यिक चर्चाएँ, वर्तमान समस्याओं पर संवाद से समाधान की ओर, नाट्य , नृत्य आदि प्रस्तुतियाँ, पुस्तक प्रदर्शनी इत्यादि आयोजन इसकी विशेषता है। इससे जुड़ने के लिए किसी भी प्रकार का मानदेय आवश्यक नहीं है, संस्था पंजीकृत है, अतः स्वेच्छा से जो भी सहायता तन, मन, धन से करना चाहते हैं, संस्था उनका स्वागत करती है।
वर्ष में एकबार नवम्बर माह में संस्था का वार्षिकोत्सव अति धूमधाम से मनाया जाता है, जिसकी सबसे बडी विशेषता संस्था द्वारा दिए जा रहे 11 सम्मान पुरस्कार राशि के साथ हैं, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाले 11 व्यक्तियों को चयन प्रक्रिया के द्वारा चुना जाता है।
जुलाई माह में सम्मान की जानकारी की सूची प्रसारित की जाती है, जिसमें आवेदन किया जा सकता है। ये सम्मान मानव मात्र के लिए हैं, जिसमें जाति, धर्म, लिंग एवम् स्थान का कोई भेद नहीं, जिसमें मात्र योग्यता का महत्व है।
बेंगलूर की सभी संस्थाओं में इस संस्था का विशेष स्थान इसके उद्देश्य और कार्यक्षेत्र के कारण है। यह एकमात्र संस्था है जो इतने सारे समूहों एवम् शाखाओं के साथ अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर साहित्य के साथ समाज, संस्कृति, शिक्षा और मानव सेवा को साथ लेकर चल रही है।
प्रश्न – 4.वर्तमान में हिंदी साहित्य लेखन की विशिष्टता को किस तरह संक्षेप में रेखांकित करना चाहेंगी?
उत्तर – वर्तमान में हिन्दी साहित्य लेखन की विशिष्टता की बात करें, तो आधुनिक युग में नई-नई विधाओं ने जन्म लिया है, या यह भी कहा जा सकता हैं कि आधुनिक युग की आवश्यकताओं एवम् परिस्थितियों से समायोजन हेतु पुरानी विधाओं को नए कलेवर में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो कि विशेष हो जाता है। सोशल मीडिया ने संक्षिप्तता को अधिक स्थान दिया है , जो कि व्यस्त जीवन के लिए अत्यावश्यक भी कहा जा सकता है। उदाहरण के लिए- लघुकथा, अकविता या छन्द मुक्त कविता, दोहों में नवीनीकरण, गजल की तर्ज पर लिखी कविताएँ एवम् मुक्तक आदि।
आज रचनाएं सर्वाधिक मात्रा में होने लगी हैं, यह विशेषता कही जा सकती है, किन्तु साहित्य की कसौटी पर कितनी खरी उतरती हैं, यह विचारणीय भी है। पाठक वर्ग से लेखकवर्ग ही अधिक हो गया है, यह भी विशेष कहा जा सकता है, हालाँकि इसके कारण झूठी वाहवाही भी बढ़ गई है, गुणवत्ता की कमी कभी-कभी खलती है।
प्रश्न – 5.आप जिस जैन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत हैं। इसके बारे में जानकारी प्रदान करें।
उत्तर – मैं जैन विश्वविध्यालय के जैन विभाग में पी.एच- डी कोरडिनेटर एवम् असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हूँ। यह विश्वविद्यालय कर्नाटक के बेंगलूरू में है, जो कि आज शिक्षा के क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित कर चुका है।
जैन विभाग के अन्तर्गत यहाँ जैन धर्म के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाती है। जिसमें सभी साधु-साध्वी के लिए बिना फीस के भी शिक्षा का प्रावधान है। आज के युग में जहाँ की जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है, तनाव से भरा हुआ है है, समय की कमी खलती है, वैसे में यह विभाग कार्यरत सभी को शिक्षा एवम् ज्ञान मिल सके ,इस बात का विशेष ध्यान रखते हुए ऑनलाइन और ऑफलाइन, सप्ताहांत कक्षाएँ, रिकार्डेड कलासेस,पठन पाठन की सामग्री आदि सभी प्रकार से शिक्षा या ज्ञान के लिए इच्छुक शोधार्थियों को हर सुविधा उपलब्ध कराता है। घर या कार्यस्थल के साथ संयोजित शिक्षा का यह माध्यम जितना प्रभावशाली है उतना ही इसका सिलेबस भी प्रभावशाली है। सिलेबस सिद्धांत एवम् प्रयोग दोनों पर आधारित हैं, जो जैन विज्ञान को अनुभूत करने एवम् चारित्रिक स्तर पर जीवन की कला भी एक दोस्ताना माहौल में सिखा जाते हैं। यहाँ जैन दर्शन के साथ अन्य दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाता है। जैन अध्ययन में मास्टर डिग्री और पी.एच- डी विभाग भी हैं। जैन विश्वविद्यालय के पोर्टल पर सभी जानकारियाँ विस्तार से उपलब्ध हैं।
डॉ इन्दु झुनझुनवाला जैन
अभ्युदय अन्तरराष्ट्रीय संस्था, बेंगलूरू- संस्थापक अध्यक्ष
सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक स्वैच्छिक कार्यकर्ता
कवयित्री, लेखिका, समालोचक, मोटिवेशनल स्पीकर एवं अनुवादक , समाजसेवी
25 पुस्तकों का सम्पादन
8 स्वरचित पुस्तकों का प्रकाशन
अनेकों सम्मान प्राप्त।
वर्तमान में जैन विश्वविद्यालय में जैन विभाग में पी.एच-डी कोर्डिनेटर एवम् असिस्टेंट प्रोफेसर।




