कवयित्री और लेखिका सुखमिला अग्रवाल से राजीव कुमार झा की बातचीत।

साहित्य: साक्षात्कार

 

 

प्रश्न :1- काव्य सृजन में आपकी अभिरुचि विशेष रूप से रही है और साहित्य में आपकी विशिष्ट पहचान एक कवयित्री के रूप में रही है। आपने किन – किन काव्य रूपों में कविता लेखन किया। अपनी भावाभिव्यक्ति के बारे में आप कहना चाहेंगी?

उत्तर: जी हा‌ँ, काव्य के प्रति मेरा रुझान बचपन से ही था। रेडियो पर भी बाल कविता पढ़ आया करती थी। मुझे आम तौर पर नारी तथा सामाजिक विषयों पर लिखना पसंद है। दोहे, कुंडलिया, माहिया तथा छंद मुक्त भी लिख लिया करती हू‌ँ।

प्रश्न: 2-आपने हिंदी और समाजशास्त्र इन दोनों ही विषयों में एम.ए. किया है। वर्तमान समय में साहित्य में समाजोन्मुखता की प्रवृत्ति को लेकर लिखा जा रहा है। साहित्य और समाज के संबंधों के बारे में आप अपने विचारों से अवगत कराइए।

उत्तर: साहित्य समाज का अभिन्न अंग है। जितना अच्छा व उपयोगी साहित्य लिखा जाता है ,उतना समाज उन्नत होता जाता है। इसलिए आज की विसंगतियां देखते हुए एक साहित्यकार होने के नाते समाजोपयोगी लेखन पर ध्यान केंद्रित रखना व प्रेरणास्पद लिखना आवश्यक है।

प्रश्न:3- आपने कबीर के बारे में पुस्तक रचना की है। निर्गुण मत के महान कवि के रूप में कबीर के जीवन चिंतन को रेखांकित कीजिए।

उत्तर: कबीर साहिब के दर्शन को शब्दों में व्यक्त कर देना वैसा ही है जैसे बाल्टी में समंदर को भर देना। जाती धर्म क्षेत्र समुदायों से ऊपर उठकर आम जीवन की गहन अनुभूतियों से अध्यात्म तक का गूढ़तम साहित्य कबीर जी की विलक्षणता का द्योतक है।
कबीरजी का साहित्य व दर्शन कालातीत है, जब तक पृथ्वी पर जीवन रहेगा, उसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी।

प्रश्न:4- कबीर के अलावा भक्ति काल के कवियों में जिन अन्य कवियों ने आपके मानस को प्रभावित किया उनके बारे में बताइए।

उत्तर : कबीर के अलावा भक्ति काल के महान कवि युगदृष्टा संत तुलसीदास जी का सम्पूर्ण साहित्य एक अलौकिक प्रेरणा से लिखा गया ऐसा साहित्य है जिसने मानव जीवन की सूक्ष्म से सूक्ष्म जटिलता को परिभाषित किया। ऐसा अद्भुत साहित्य जो जनमानस की रग-रग में समाहित हो, शायद ही कोई दूसरा हो सकेगा।

प्रश्न:5- आपकी अभिरुचि संगीत में भी है। संगीत को काव्य के प्रमुख तत्व के रूप में देखा जाता है। वर्तमान दौर में कविता संगीत के सहज संस्पर्श से दूर क्यों होती चली जा रही है?

उत्तर: संगीत एक रूहानी अहसास माना जाता है जिसकी अभिव्यक्ति के लिए साहित्य व संगीत अभिन्न अंग हैं। क्योंकि आजकल जीवन में भौतिकता अधिक आ गई जिसके परिणामस्वरूप अब लेखन मुक्त ज्यादा होने लगा है।

प्रश्न:6- क्या ग़ज़ल लेखन उसकी सांगितिक योजना में समाहित आरोह – अवरोह के कारण लोकप्रिय हो रहा है?

उत्तर: जी बिल्कुल, लेखन में मधुरता संगीत से आती है। आरोह-अवरोह ,ताल-लय, सुर-गति, इन सबके प्रभाव से ग़ज़लों का सूफियानापन आकर्षित करता है।

प्रश्न:7- मौजूदा दौर में नारी और खासकर बालिकाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाएं सारे देश के लोगों के हृदय को विचलित कर रही हैं। इसके पीछे क्या हमारी सामाजिक – वैधानिक व्यवस्था की कमियों को देखना आपको कितना उपयुक्त प्रतीत होता है?

उत्तर: यह सच है कि मनुष्यता का घोर पतन होने के कारण ऐसी हृदयविदारक घटनाएं घटित हो रही हैं। हमारी सामाजिक वैधानिक व्यवस्था जिस दिन आरोपियों पर तीव्र व कठोरतम कार्यवाही करेगी, उस दिन समाज में आमूलचूल परिवर्तन होगा।

प्रश्न:8- अपने जीवन के शुरुआती दौर में नारी स्वावलंबन की गतिविधियों से आप जुड़ी रहीं और निजी तौर पर आप इस दौरान सक्रिय बनी रहीं। आज भी समाज में इस प्रकार के कार्य और इससे जुड़ी गतिविधियों की जरूरत आप किस रूप में महसूस करती हैं?

उत्तर: जी हां, मैं कई वर्षों तक महिलाओं व बालिकाओं के अधिकारो, कर्त्तव्यों के बारे में जागरूकता का अभियान चलाती रही जिसमें निःशुल्क रोजगारोन्मुखी कक्षाएं चलाना भी शामिल रहा। मैंने यह महसूस किया कि ज्यादातर नीचे तबके की महिलाएं पीड़ित,दबी कुचली सहमी जिंदगी जीने को मजबूर हैं, उन्हें शिक्षित कर मुख्य धारा में जोड़ने की नितांत आवश्यकता है।

प्रश्न:9- आप किस शहर की निवासी हैं। अपने मायके और ससुराल के लोगों के बारे में बारे में बताइए।

उत्तर: जयपुर मेरा जन्मस्थान है। मेरे पिताजी लगभग नब्बे वर्ष पहले सामोद गा‌ँव से छठी कक्षा पढ़कर आगे पढ़ने जयपुर आये, यही पोस्ट ग्रेजुएशन व भारत सरकार में नौकरी की। हम सब भाई-बहनों का जन्म पढ़ाई-लिखाई विवाह सब जयपुर में ही हुए। मेरा ससुराल भी जयपुर में ही है। मेरे पति चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। हमारी दो बेटियां हैं।

प्रश्न10.और अंत में, लेखिका के रूप में समाज को क्या कहना चाहती हैं ?

उत्तर: कहना बहुत कुछ चाहती हू‌ँ लेकिन अभी इतना अवश्य कहू‌ँगी कि हम सभी को आत्मविश्लेषण की घोर आवश्यकता है क्योंकि समाज हमसे ही बना है और यदि समाज पतन की ओर जा रहा है तो एक दूसरे पर अ‌ँगुली उठाने की बजाए पतन का कारण खोजें और उसमें हम कितने भागीदार हैं, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से,उसे सुधारें.. समाज अपने-आप सुधरने लगेगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button