उत्तर प्रदेश के इटावा की कवयित्री राज़दा राज़ से राजीव कुमार झा की बातचीत…

साहित्य: साक्षात्कार

प्रश्न – आप किस प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का सृजन करती हैं?

उत्तर- मैं कविता, गीत , शेर, ग़ज़ल तथा मुक्तक का सृजन करती रही हूं । इसके साथ-साथ सम-सामयिक शैक्षिक लेख भी लिखती हूं जो अख़बारों और पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होते हैं। ज़ल्द ही मेरे काव्य संग्रह भी प्रकाशित होंगे।

प्रश्न – आपके घर -परिवार माता-पिता और शिक्षा दीक्षा के विषय में जानकर ख़ुशी होगी।

उत्तर- मैं मूलतः इत्र नगरी कन्नौज, उत्तर प्रदेश से हूं। मेरे पिताजी को सरकारी इंजीनियर होने के बावज़ूद हिंदी और अंग्रेजी भाषा लिखने – पढ़ने और पढ़ाने से विशेष लगाव था । उन्होंने हिंदी – अंग्रेजी भाषा और सामान्य ज्ञान की कई पुस्तकें लिखीं। स्त्री शिक्षा के विशेष ज़बरदस्त पक्षधर थे। शिक्षा से उनका बेहद प्यार था। अपने पूरे परिवार को उन्होंने उच्च शिक्षित किया जिसकी वज़ह से हम तीनों बहनें सरकारी सेवा में हैं। इसीलिए शायद लिखने का सौभाग्य मुझे पिताजी से विरासत में मिला।

प्रश्न -हमारे देश में उर्दू अब सिर्फ़ कुछ मुसलमानों के बीच सिमट कर रह गई है! इस भाषा का गहरा प्रभाव हिंदी पर दिखाई देता है। उर्दू की भूमिका के बारे में बताइए।

उत्तर- भाषा पर किसी धर्म विशेष का अधिकार नहीं है। गुलज़ार और फ़िराक गोरख़पुरी को कौन नहीं जानता ,ग़ज़ल व शायरी के शिखर पुरुष रहे । उर्दू इतनी सहज़ और प्यारी भाषा है जो अपनी ख़ुशबू से रूह तक महका देती है। गंगा- जमुनी तहज़ीब की तरह इसे भी हिंदी से अलग नहीं किया जा सकता।

प्रश्न -हिंदी लेखन और साहित्य के प्रति आपका झुकाव कब और कैसे हुआ ?

उत्तर- मेरे माता-पिता ने घर में अच्छा शैक्षिक वातावरण दिया। जिससे मेरी बचपन से ही कविताओं ,गीतों, ग़ज़लों में रुचि थी । लेकिन सौभाग्य से लिखने का काम इटावा आने पर शुरू किया। ‘पहल’ ‘पल्लवन’ ‘उत्तर प्रदेश साहित्यिक सभा’ के माध्यम से गीतकार डॉ राजीव राज़ के सहयोग से इस पथ पर अग्रसर हूं। इसकी उर्वरा भूमि में साहित्य बहुत समृद्ध है। इटावा महाकवि गंग, शिशुपाल ‘शिशु’, गोपाल दास नीरज, गुलाब राय की पावन जन्मभूमि रही है। मेरी कलम पर इसका विशेष असर हुआ।

प्रश्न – इटावा के बारे में जानकारी दीजिए। यहां के समाज ,साहित्य ,संस्कृति, और इतिहास के बारे में आपसे जानकर ख़ुशी होगी।

उत्तर – दिल्ली कोलकाता राष्ट्रीय मार्ग 2 पर स्थित महाभारत काल से ‘इष्टिकापुरी ‘नाम से जाना जाने वाला इटावा यमुना और चंबल नदी को सहेजे उत्तर प्रदेश का महत्वपूर्ण ज़िला है। यहां स्थित चक्र नगर में पांडवों ने अज्ञातवास बिताया। 1857 की क्रांति के समय ये कई क्रांतिकारियों की भूमि रही है। यहां चंबल के बीहड़ में कई फिल्में बनी । प्राचीन सुमेर सिंह का किला , इटावा महोत्सव, कालीबांह मंदिर, लाइन सफारी और अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम तथा हवाई पट्टी ,पी. जी. आई .सैंफई मौजूद है। ये पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह तथा अखिलेश यादव का गृह जनपद भी है। इसकी संस्कृति यहां के लोगों की भाषा,हिंदू मुस्लिम के त्यौहारों, वेशभूषा, कला,संगीतआदि में स्पष्ट रूप से झलकती है। राष्ट्रपति पुरस्कार पाने वाले जनपद के पहले कवि शिशुपाल सिंह ‘शिशु’ का साहित्यिक योगदान गौरवशाली है।

प्रश्न 6 – आप अपनी कोई कविता यहां प्रस्तुत कीजिए-

उत्तर- यहां मैं अपनी एक कविता शीर्षक बचपन प्रस्तुत कर रही हूं।

बचपन

बचपन के दिन
अच्छे थे…
कितने पावन सच्चे थे..!

जब हम छोटे
बच्चे थे …
कितने पावन
सच्चे थे..!!

जो मिल जाए
कम नहीं था …
हार और जीत का ग़म नहीं था ..!
मस्त वो चौके – छक्के थे…!
कितने पावन
सच्चे थे..!!

पल – पल ख़्वाब संजोता था …
बोझ ना दिल पर होता था..!
जब कांधों पर
बस्ते थे …
कितने पावन
सच्चे थे…!!

# मन इतना निश्छल होवे…
माटी में पैसे बोवे..!
अपनी धुन के
पक्के थे…
कितने पावन
सच्चे थे..!!

#मज़हब धर्म की
बात नहीं …
इनकी कोई
जात नहीं ..!
बैर के धागे कच्चे थे …
कितने पावन
सच्चे थे..!!

# हाय ! ग़रीबी का आलम …
वो भी ना ले
पाए हम ..!
लाख खिलौने
सस्ते थे…
कितने पावन
सच्चे थे..!!

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