इंदौर के कवि हार्दिक जैन से राजीव कुमार झा की बातचीत…

साहित्य: साक्षात्कार

 

 

1. कविता लेखन में भाषा को माध्यम माना जाता है। आपने ज्यादातर अंग्रेजी में कविता लेखन किया। इसके क्या कारण हैं।

साहित्य और विशेषकर कविता के संदर्भ में भाषा केवल एक माध्यम, एक ज़रिया है, असली चीज़ तो वह ‘अहसास’ है जो रूह से निकलकर पन्नों पर बिखरता है।

मेरे लिए कविता का मूल तत्व भाषा नहीं, बल्कि भावना है। मैं हमेशा मानता रहा हूँ कि दर्द, प्रेम, अकेलापन और आत्म-संघर्ष जैसी अनुभूतियों की अपनी एक सार्वभौमिक भाषा होती है। यद्यपि मेरी मातृभाषा हिंदी है और मैं हिंदी-उर्दू साहित्य से गहरा लगाव रखता हूँ, हालांकि यह भी सही हैं कि मेरी अब तक प्रकाशित 4 स्वतंत्र (Solo) पुस्तकों में से 3 अंग्रेज़ी भाषा में हैं और 1 हिंदी में है। इसलिए प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत हो सकता है कि मैंने मुख्यतः अंग्रेज़ी में ही लेखन किया है। किंतु यदि मेरी संपूर्ण साहित्यिक यात्रा को देखा जाए, तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।

मैं अब तक 100 से अधिक साझा संकलनों (Anthologies) में अपना योगदान दे चुका हूँ, और उनमें प्रकाशित मेरी अधिकांश रचनाएँ हिंदी कविता के रूप में हैं। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि मेरी साहित्यिक अभिव्यक्ति किसी एक भाषा तक सीमित नहीं रही, बल्कि हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों ने मेरी लेखनी को समान रूप से आकार दिया है।

अंग्रेज़ी में लेखन के पीछे कई कारण हैं। पहला, अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से मेरी रचनाएँ देश-विदेश के व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँच सकीं। दूसरा, युवावस्था में मेरा साहित्यिक परिचय विश्व साहित्य और अंग्रेज़ी कविता से अधिक हुआ, जिससे अभिव्यक्ति का एक स्वाभाविक माध्यम अंग्रेज़ी बनता चला गया। तीसरा, मेरी शैक्षणिक और व्यावसायिक पृष्ठभूमि भी लंबे समय तक अंग्रेज़ी से जुड़ी रही, इसलिए विचारों का प्रवाह उसी भाषा में सहजता से आकार लेने लगा।

विशेष प्रसन्नता की बात यह है कि मेरी आगामी पाँचवीं स्वतंत्र पुस्तक (5th Solo Book) हिंदी भाषा में प्रकाशित हो रही है, जिसमे सिर्फ एक कविता हैं 10 ,732 वर्ड्स की, जो की तीन विश्व रिकॉर्ड मैं दर्ज की जा चुकी हैं। यह मेरे साहित्यिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, क्योंकि मैं मानता हूँ कि हिंदी में अभिव्यक्ति मुझे अपनी संवेदनाओं और अनुभवों के और अधिक निकट ले जाती है।

मेरे लिए भाषा कभी लक्ष्य नहीं रही, वह केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है। मैं कभी भी भाषा को साहित्य की आत्मा नहीं मानता। मेरे लिए भाषा केवल एक सेतु है; वास्तविक महत्व संवेदनाओं और उनकी प्रामाणिकता का है। चाहे रचना हिंदी में हो या अंग्रेज़ी में, मेरा प्रयास सदैव मानवीय भावनाओं, एकांत, प्रेम, पीड़ा और आत्मसंवाद को ईमानदारी से शब्द देने का रहा है।

2. आप इंदौर शहर के निवासी हैं। इस शहर में काफी सालों से रहते हुए बेहद सुकून से कविता लेखन करते रहे। आप कविता में अपनी अनुभूतियों और संवेदना के बारे में क्या कहना चाहेंगे?

इंदौर केवल मेरा निवास-स्थान नहीं, बल्कि मेरी संवेदनाओं, स्मृतियों और रचनात्मक यात्रा का अभिन्न हिस्सा है। इसी शहर की गलियों, इसकी संस्कृति, इसकी सहजता और यहाँ के शांत क्षणों ने मेरी लेखनी को निरंतर पोषित किया है। वर्षों से इंदौर में रहते हुए मैंने जीवन को बहुत निकट से देखा है—लोगों की खुशियाँ, संघर्ष, रिश्तों की ऊष्मा, बिछड़नों का दर्द और एकांत की गहराइयाँ; यही सब मेरी कविताओं का आधार बनते रहे हैं।

मेरा मानना है कि कविता का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि पाठक को उसके अपने भीतर से मिलवाना है। यदि मेरी कोई पंक्ति किसी अकेले मन को यह एहसास करा सके कि उसकी भावनाएँ अनसुनी नहीं हैं, तो मैं अपनी लेखनी को सार्थक मानता हूँ।

मैं जब इंदौर की सड़कों पर चलता हूँ, तो कोई भिखारी, कोई ठेले वाला, या कोई जल्दी में भागता हुआ ऑफिस जाने वाला—सबके चेहरे पर मुझे एक कहानी दिखती है। मैं अक्सर सोचता हूँ कि इस भीड़ में कितने लोग खुद से बात करना भूल गए हैं? मेरी कविता की सबसे बड़ी अनुभूति यही है—कि मैं इस शहर में खुद को बिल्कुल अकेला पाता हूँ, फिर भी इसी अकेलेपन में मुझे दूसरों के दर्द की आवाज़ें सुनाई देती हैं। मेरी कविता ‘Caffeinated Verses’ में जो तन्हाई है, वह मैंने इंदौर की कॉफी शॉप पर बैठकर ही देखी है—जहाँ लोग तो बहुत हैं, पर हर कोई अपनी ‘स्क्रीन’ में खोया हुआ है।

इंदौर की शांत रातों, व्यस्त दिनों और जीवन की साधारण-सी दिखने वाली घटनाओं ने मुझे यह सिखाया है कि संवेदनाएँ ही मनुष्य को मनुष्य बनाती हैं। शायद इसी कारण मेरी कविताओं में बाहरी शोर से अधिक भीतर की खामोशी सुनाई देती है। मैं आज भी उसी विश्वास के साथ लिखता हूँ कि कविता केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मा और जीवन के बीच चलने वाला एक सतत संवाद है।

इंदौर अपनी ‘मिठास’ के लिए जाना जाता है। लेकिन मेरी कविता में वह मिठास नहीं, बल्कि वह ‘कड़वाहट’ है जो जीवन की सच्चाई से आती है। फिर भी, जैसे इंदौर का ‘पोहा’ सुबह की पहली किरण के साथ ताज़गी देता है, वैसे ही मैं चाहता हूँ कि मेरी कविताएँ पाठकों की सुबह को एक नया नज़रिया दें। मेरी अनुभूति कहती है कि “इंदौर ने मुझे चलना सिखाया, लेकिन लिखना मैंने इसी शहर की थकान के बीच बैठकर सीखा।”

3. आपने सैकड़ों एनथोलाजी का संपादन किया है। सोशल मीडिया के माध्यम से एक नयी पुस्तक संस्कृति का विकास समाज में हो रहा है। इसमें कविता काफी व्यापक भूमिका में है। इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

मुझे यह देखकर अत्यंत प्रसन्नता होती है कि सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों ने साहित्य, विशेषकर कविता, को एक नए युग में प्रवेश कराया है। आज पुस्तक संस्कृति केवल पुस्तकालयों या पारंपरिक प्रकाशन संस्थानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप समूहों और विभिन्न साहित्यिक मंचों के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुँच रही है। यह परिवर्तन साहित्य के लोकतंत्रीकरण का एक सकारात्मक संकेत है।

मैं स्वयं अनेक एंथोलॉजीज़ के संपादन से जुड़ा रहा हूँ और मेरा अनुभव यह रहा है कि इन साझा संकलनों ने देश के विभिन्न भागों में छिपी हुई प्रतिभाओं को एक मंच प्रदान किया है। ऐसे अनेक युवा रचनाकार, जिन्हें पहले अपनी रचनाओं के प्रकाशन का अवसर नहीं मिल पाता था, आज सोशल मीडिया और सामूहिक पुस्तकों के माध्यम से अपनी रचनात्मक पहचान बना पा रहे हैं।

विशेष रूप से कविता ने इस नई पुस्तक संस्कृति के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कविता अपनी संक्षिप्तता, भावनात्मक गहराई और सहज सम्प्रेषणीयता के कारण डिजिटल युग के पाठकों के साथ बहुत जल्दी जुड़ जाती है। आज का युवा वर्ग छोटी-छोटी कविताओं, मुक्तकों, ग़ज़लों और विचारपरक रचनाओं के माध्यम से साहित्य के प्रति आकर्षित हो रहा है, जो निस्संदेह एक सुखद संकेत है।

हालाँकि, मेरा मानना है कि इस बढ़ती हुई लोकप्रियता के साथ साहित्यिक गुणवत्ता, भाषा की शुद्धता और मौलिकता के प्रति सजग रहना भी उतना ही आवश्यक है। केवल अधिक प्रकाशित होना ही साहित्यिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि ऐसी रचनाएँ सृजित करना अधिक महत्वपूर्ण है, जो समय की कसौटी पर भी प्रासंगिक बनी रहें और पाठकों के मन में स्थायी स्थान बना सकें।

मेरे विचार से सोशल मीडिया ने पुस्तक संस्कृति को नई गति दी है, और कविता इस परिवर्तन की सबसे सशक्त वाहक बनकर उभरी है। यदि इस माध्यम का उपयोग गंभीरता, संवेदनशीलता और साहित्यिक उत्तरदायित्व के साथ किया जाए, तो आने वाले समय में यह भारतीय साहित्य के लिए एक अत्यंत समृद्ध और सृजनात्मक युग का निर्माण कर सकता है।

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