तीर्थराज:बड़हिया में भाजपा की लहर और समाजवादी राजनीति का अवसान
बिहार पटना, भारत पोस्ट संवाददाता, मुसलमानों का अब हिन्दुओं से कोई विरोध नहीं है और उनको अच्छा लगता है कि हिन्दू अब अपने देश को अपना देश मानते हैं और शासन सत्ता को यहां उसी हिसाब से संगठित करने में जुटे हैं। भारत में हिन्दुओं के अलावा सिर्फ मुसलमान ही नहीं हैं यहां कई संप्रदाय के लोग हैं। अंडमान में तो अभी भी जंगली जीवन संस्कृति के लोग निवास करते हैं और मंदिर मस्जिद विवाद से उनका दूर का भी रिश्ता नहीं है। बिहार में भूमिहार यहां के प्रमुख तबकों में हैं और इनकी खासियत है कि आज के जमाने में भी इस जाति के लोग समाज में नाम के पीछे ज्यादा नहीं भागते हैं और दाम से ही किसी चीज की कीमत वह आंकते रहे हैं। चाहे देश हो या धर्म हो और काशी मथुरा की कहानी उनके लिए शहरों के हिन्दू मुस्लिम नामकरण की कहानी मात्र नहीं है। शायद इसलिए भी लालू प्रसाद से भूमिहारों ने कभी कोई मतलब नहीं रखा और जिसको मन हुआ उसको उन्होंने वोट दिया।
प्रयागराज का नाम फिर से इलाहाबाद कराने के लिए उत्तर प्रदेश के मुसलमान समाजवादी पार्टी को वोट देंगे यह सोचना नितांत मूर्खतापूर्ण माना जा सकता है। मुसलमान जानते हैं कि आजादी से पहले जब इस्लामिक हुकूमत इस देश में थी तब भी हिंदू निरंतर अपने धर्म स्थलों और नगरों की गरिमा के सवाल को लेकर बलिदान देते रहे हैं और अपनी निष्ठा से ही यहां के लोगों ने अपना धर्म बचाया है। मुलायम सिंह यादव को बड़हिया महिला महाविद्यालय के किसी कार्यक्रम में कपिलदेव सिंह ने आमंत्रित किया था।
उनके साथ अमर सिंह और राज बब्बर इन सब महानुभावों का भी यहां आगमन हुआ लेकिन वह कोई राजनीतिक जलसा नहीं था। अगर ऐसी बात होती तो उस दिन ही प्रयागराज और इलाहाबाद का विवाद यहां सुलझ जाता। कुंभ में बिहार के बड़हिया से रोज लोग प्रयागराज गंगा स्नान के लिए जाते रहे। लोहिया चौक से रोज बस खुलती थी। कभी बिहार में बड़हिया समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता था लेकिन यहां के जमींदारों ने सदैव कांग्रेस का साथ दिया और आज भी कांग्रेस के सत्ता में वापसी के आसार लेकर वह यहां राजनीतिक जलसों में शिरकत करते दिखाई देते हैं। भूमिहार जो बिहार में जमींदार भी माने जाते हैं इनको कोई धर्म अध्यात्म और राजनीति की सीख कोई अगर नहीं दे तो यह ज्यादा अच्छा है क्योंकि इन्होंने देश के अलावा धर्म और संस्कृति के साथ अपना प्रेम सदैव जितनी सच्चाई से प्रकट किया वह इनको आज भी तमाम जगहों पर प्रतिष्ठित करता है। उज्जैन काशी हरिद्वार हर शहर वह आया – जाया करते हैं और भाजपा से सदैव वह आशा करते हैं कि राजनीति में धर्म की अवमानना के भाव को वह बिल्कुल खत्म करके भारत को आध्यात्मिक चेतना का एक देश वह बनाने में निरंतर सक्रिय रहे। बड़हिया के जमींदार इस बात को जानते हैं कि देश में शहरों का नाम बदलने के खेल में कोई भी पार्टी और राजनीतिज्ञ अगर शामिल नहीं हो तो यह बिहार के लिए बेहतर होगा। लालू प्रसाद ने पटना रेलवे स्टेशन का पुनर्निर्माण जब करवाया तो शायद इसीलिए भी इस स्टेशन का नाम उन्होंने नहीं बदला क्योंकि किसी जगह का नाम बदलने से आदमी का काम खराब या अच्छा नहीं हो जाता है। लालू प्रसाद का काम अनुचित नहीं था और पटना रेलवे स्टेशन का शानदार भवन बनकर तैयार हो गया लेकिन गौहाटी आज भी पटना के मुकाबले आपको बेहतर और सुंदर शहर प्रतीत होगा। अंततः आप अपने इस शहर का पटना हो या पाटलिपुत्र जो भी नाम रखना हो रख लीजिए लेकिन हिंदू मुस्लिम विवाद का रंग इन सब प्रकरणों को नहीं दिया जाना चाहिए और ऐसा हो तो बेहतर होगा। अब मुसलमानों के वोट के लालच में अखिलेश यादव ने सत्ता में आने के बाद प्रयागराज का नाम बदलकर फिर इलाहाबाद करने का ऐलान किया है। किसी जमाने में समाजवादी पार्टी की तूती उत्तर प्रदेश ही नहीं संसद में भी बोलती थी लेकिन इस पार्टी का खात्मा हो गया और धर्म जाति केन्द्रित सोच ने मायावती के साथ अखिलेश यादव का भी बेड़ा ग़र्क करके रख दिया है। उत्तर प्रदेश में मुसलमान समाजवादी पार्टी की निगरानी में अपराध में भी शामिल होने लगे और
काफी मुश्किल से भाजपा सरकार ने उनको काबू में किया है।


