सुपरिचित लेखिका गीता रस्तोगी ‘गीतांजलि’ से राजीव कुमार झा की आत्मीय बातचीत…

साहित्य: साक्षात्कार

 

आप किसी भी माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करें, मगर अभिव्यक्ति जरूरी है! गीता रस्तोगी ‘गीतांजलि ‘

प्रश्न: आपकी दृष्टि में लेखन के उद्देश्य क्या हैं?

उत्तर: मेरे मतानुसार हर इंसान के पास जो भी विचारशीलता और चिंतन की प्रक्रिया है, उसके चलते कुछ न कुछ कहने के लिए होता हैं। विचार प्रक्रिया ज्यों-ज्यों गहन होती चली जाती है, त्यों-त्यों उसके भीतर की अभिव्यक्ति अपनी राह तलाश करती है। इस हेतु ये सभी कलाएं हैं, गायन, वादन, नृत्य और लेखन। और भी कितने ही माध्यम हैं अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के। आप किसी भी माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करें, मगर अभिव्यक्ति जरूरी है। यदि आपके भीतर कल्याण की भावना है तो भी और यदि नकारात्मक भावनाएं हैं तो भी , उनको अभिव्यक्त करना जरूरी है। यदि आपके पास विचार और चिंतन की एक तीव्र प्रक्रिया है, जो निरंतर चलती रहती है और आप स्वयं को अभिव्यक्त नहीं करते तो आपकी विचार ऊर्जा किसी भी माध्यम से प्रकट होगी ही होगी। लेखन अभिव्यक्ति इस एक सशक्त व कल्याणकारी माध्यम है। इससे आप एक ऐसे समाज से जुड़ते हैं जो आप ही की तरह विचारशील हैं और समाज में कुछ सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता और एक अकेला व्यक्ति यदि चीख-चीख कर कुछ कहने का प्रयत्न कर रहा है तो वह उपहास का पात्र बन जाएगा; जबकि संभव है कि उसकी बात बहुत अधिक सही, सटीक और सामयिक हो। मगर समयाभाव के कारण अकसर ऐसे लोगों की बात को अनसुना कर दिया जाता है। दूसरी ओर जब किसी युग की सामयिक समस्याओं पर उस युग के एक बड़े लेखक वर्ग की कलम चलती है तब स्वर्णिम इतिहास रचे जाते हैं जो केवल पुस्तक के पन्नों तक ही सीमित नहीं रहते वरन संवेदनशील हृदयों को आंदोलित कर समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की ताकत रखते हैं।

प्रश्न: आप लेखन की ओर कैसे उन्मुख हुईं? कोई विशेष घटना या व्यक्ति जिनसे आपको यह प्रेरणा मिली?

उत्तर: हम सब रोज थोड़ा-थोड़ा बदलते हैं। यह सब इतना चुपके से होता है कि अकसर ही इससे अनभिज्ञ ही रह जाते हैं। अपने शरीर का ही उदाहरण लीजिए। बाहर से यह एक त्वचा के खूबसूरत आवरण से ढंका हुआ है जिस पर कभी- कभार कोई चोट लग जाए तो पीड़ा का अनुभव होता है। छोटा-मोटा घाव हो तो उसे भरने में कुछ दिन का समय लग जाता है। मगर शरीर के भीतर रोजाना कितनी ही कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होती हैं और कितनी ही नवनिर्मित होती हैं जिनका पता भी नहीं लगता। यदि हम विज्ञान पढ़ते हैं तो ही हमें इस का ज्ञान होता है अन्यथा सामान्य जीवन के चलते वह भी नहीं होता। ऐसी ही यह जो पाठक से लेखक बनने की प्रक्रिया है या इसे परिघटना भी कह सकते हैं, यह भी चुपके- चुपके घटित होती है। मैं भी बचपन में नहीं जानती थी कि बड़ी होकर लेखिका बनूँगी। बचपन से ही पढ़ने का बहुत शौक था। स्कूल में भी पढ़ने के इस शौक को खूब बढ़ावा मिलता था। परीक्षाओं में श्रेष्ठ प्रदर्शन दिखाए जाने पर पुरस्कार स्वरूप भी पुस्तकें ही मिलती थीं। स्कूल में पुस्तकालय की सुविधा भी थी जिसमें हम बच्चे अपनी पसंद की पुस्तकें वहां बैठ कर भी पढ़ सकते थे और उन्हें एक सप्ताह के लिए घर भी ले जा सकते थे। जैसे बच्चे खिलौनों को देख कर खुश होते हैं, ऐसी खुशी अच्छी पुस्तकें मिल जाने पर होती थी। अपने घर में भी पुस्तकों का भंडार था और कहीं रिश्तेदारी में गए तो भी उनके घर के किस कोने में पुस्तकें रखी होंगी, निगाहें यही ढूंढ़ती रहती थीं।
मुझे लगता है कि लेखन की शुरुआत तब होती है जब आप कुछ कहना चाहें और कोई सुनने वाला न हो। मैंने अपने कॉलेज के दिनों में भी इक्का-दुक्का कविताएं लिखी थीं। हमारी एक आदरणीय टीचर थीं, राजेश दीदी जो हमारे परिवार की काफी घनिष्ठ भी थीं, और वह लेखिका व कवयित्री थीं। उन्होंने अपनी पुस्तक के विषय में कुछ लिखने को प्रेरित किया तब मैंने संक्षिप्त पुस्तक समीक्षा लिखी।
एक अन्य वरिष्ठ लेखक थे आदरणीय श्री विष्णु पंकज जी, वे भी अकसर घर आया करते थे, उन्होंने भी मुझे लेखन की ओर प्रेरित किया।

प्रश्न :आपने लेखन कब प्रारंभ किया ?

उत्तर: यूँ तो कह सकते हैं कि लेखन का अंकुर तो छात्र जीवन में ही फूट गया था मगर इसके विशाल वृक्ष बनने में कई वर्ष का समय लगा। अपने अध्यापन काल के प्रारंभिक वर्षों में लेखन कार्य बाधित रहा मगर बाद के वर्षों में लेखन की ओर रुझान बढ़ा । वर्ष 2009 से मैं थोड़ा-सा खाली समय मिलते ही अपने विचारों को लिपिबद्ध करने बैठ जाती थी। मगर प्रकाशन की सुविधा मिली, सन 2017 से। तब मैंने अपनी रचनाओं का प्रकाशन ऑनलाइन प्लेटफार्म प्रतिलिपि पर करना शुरू किया।

प्रश्न:अपने साहित्यिक सफर में अपने रचनात्मक लेखन के विषय में क्या कहना चाहेंगी ?

उत्तर:लेखन के प्रारंभिक वर्षों में मैं सामान्यतः निबंधात्मक शैली में ही लिखती थी। तत्पश्चात लघुकथाएं, कविताएँ और कुछ व्यंग्य भी लिखने लगी। ऑनलाइन प्रकाशन से ऑफलाइन प्रकाशन की ओर आने में लगभग छह बरस का समय लगा। पहली पुस्तक के प्रकाशन की भूमिका भी कैसे बनी, यह भी एक भगवान द्वारा बनाया गया एक विचित्र-सा संयोग ही था। मुझे एक ग्रुप पर एक बाल साहित्य की पुस्तक के निःशुल्क प्रकाशन योजना के बारे में पता चला। उसकी एक निर्धारित तिथि थी और योजना में राजस्थान के लेखकों को वरीयता दिए जाने का प्रावधान था। यद्यपि मैं अब तक टाइपिंग में एक्सपर्ट हो चुकी थी मगर मुझे पुस्तक की पांडुलिपि की फाइल और पीडीएफ बनाने का कोई अनुभव न था। समझ नहीं पा रही थी कि निर्धारित तिथि तक वह सबमिट कर भी पाऊंगी या नहीं। यद्यपि जो प्रकाशक ने जितनी भी पृष्ठ सीमा मानदंड रखे थे, उसके अनुसार मेरे पास बाल कथाएं उपलब्ध थीं। मैंने समझ लिया कि इस योजना का लाभ मैं न ले पाऊंगी। मगर वह योजना इतनी अच्छी थी कि मेरा मन था कि मैं इस योजना के बारे में किसी को बताऊं ताकि वह लाभान्वित हो सकें। प्रतिलिपि पर एक लेखक जो राजस्थान के ही मूल निवासी थे, मैंने उन्हें लिखित संदेश द्वारा इस योजना के बारे में सूचित किया और उन्हें इस योजना का लाभ भी मिला। यद्यपि मैं वहाँ पांडुलिपि जमा न कर पाई तब भी मेरे भीतर पुस्तक प्रकाशन की प्रबल इच्छा जन्म ले चुकी थी। तभी मेरी एक स्टूडेंट जिसे कंप्यूटर की जानकारी मुझसे अधिक थी, मुझे मिली। उसकी सहायता से मैंने अपनी पहली पुस्तक की पांडुलिपि तैयार की। इसी प्रकार मुझे एक अच्छी प्रकाशक भी मिल गई और मेरी पहली पुस्तक हिंदी में प्रकाशित हुई ‘भोलू का सतरंगी इंद्रधनुष’। इसके प्रकाशन के तुरंत बाद मुझे प्रेरणा हुई कि मैं इसका अनुवाद अंग्रेजी में करूं। कम समय में अनुवाद करने के लिए कोई भी अनुवादक मुझे न मिला तो यह अनुवाद भी मुझे स्वयं ही करना पड़ा। इसके अंग्रेजी अनुवाद के प्रकाशन के दिन ही मुझे एक ऑफर मिला कि मैं इसका इटालियन भाषा में अनुवाद करा लूं। इससे पुस्तक को इटली के बोलाग्ना पुस्तक मेले में जाने का अवसर मिलेगा। और मैंने यह ऑफर स्वीकार कर लिया । इस प्रकार विदेशी भाषाओं में अनुवादों की यह श्रृंखला शुरू हुई जिसके अंतर्गत अब तक इतालवी, जर्मन, फ्रेंच, थाई,स्पेनिश, फ़िलिपीनो,अरबी,ग्रीक, माल्टीज़, तुर्की, बुल्गारियन, स्लोवाक भाषाओं में यह पुस्तक अनूदित हुई है।

प्रश्न :इस पुस्तक में किस प्रकार की कहानियां हैं और कौन-से आयु वर्ग के लिए हैं?

उत्तर : इस पुस्तक में कुल सोलह कहानियां हैं जिनमें चौदह कहानियां और दो लंबी कहानियां हैं जिन्हें आप लघु उपन्यास भी कह सकते हैं। बीस वर्षों के एक लंबे अंतराल तक अध्यापन के दौरान बालगोपालों के सान्निध्य में समय बिताने का जो आशीर्वाद मिला इसी से अधिकांश कहानियां यथार्थ जीवन के अनुभवों पर आधारित हैं और कुछ कहानियों में आपको कल्पना का पुट भी नजर आएगा। ये कहानियां आठ से पंद्रह सोलह वर्ष तक के आयु वर्ग के बच्चों को खूब पसंद आएंगी। यूँ तो बड़े भी इन्हें मज़े लेकर पढ़ेगे ( यदि बाल साहित्य में रुचि है तो)। मेरा यह मानना है कि चाहे आप कितने भी बड़े हो जाएं, बाल साहित्य अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि हम अभिभावक, अध्यापक या अन्य किसी भी रिश्ते नाते से बालगोपालों की भावनाओं से जुड़ाव महसूस कर सकें, उनके मनोविज्ञान को समझ सकें और यह उनकी अच्छी परवरिश में सहायक भी है।

प्रश्न: आप अपनी इस पुस्तक के अतिरिक्त अन्य प्रकाशित पुस्तकों के बारे में भी बताइए।

उत्तर: इसके बाद मेरी अगली पुस्तक ‘वामाक्षी की अनुस्मृतियां’ हैं , जो उपन्यास के रूप में है और बाल संस्मरणों पर आधारित है।
इसको बच्चे व बड़े सभी रुचिपूर्वक पढ़ सकते हैं। जिन्होंने भी इस पुस्तक को पढ़ा है, उन्होंने अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस पुस्तक को पढ़ते समय उन्हें ऐसा लगा कि मानो वे वापस अपने बचपन में चले गए।
इसके अतिरिक्त एक अन्य उपन्यास ‘कनक कनक ते सौ गुनी ‘ भी है जो एक प्रेम कहानी है। एक साझा कहानी संग्रह ‘ बिखरे मोती’ मेरे द्वारा संपादित पुस्तक है, जो बाल साहित्य के अंतर्गत नहीं आती । इसमें मेरे सहित चार प्रतिष्ठित साहित्यकारों की कहानियां संकलित हैं।

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