उत्तराखंड के पौड़ी की कवयित्री सुशीला राजपूत से राजीव कुमार झा की बातचीत…
साहित्य: साक्षात्कार
प्रश्न: उत्तराखंड के जनजीवन यहां के लोकजीवन समाज और संस्कृति की विशेषताओं के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर : उत्तराखंड के जनजीवन की छटा उसका प्राकृतिक सौंदर्य, समृद्ध वन संपदा, नदियाँ, पर्वत यहां के लोगों के जनजीवन, लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था, उत्सवप्रियता के साथ उनकी सरलता में झलकती है। पर्वतों की गोद में बसा जीवन संघर्ष और सौंदर्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
प्रश्न: क्या अपने नाम और विशेषण के अनुरूप उत्तराखंड देवभूमि है?
उत्तर: जी, बिल्कुल मैं भाग्यशाली हूं मैने उत्तराखंड की पावन धरती पर जन्म लिया है, यहां प्रकृति का अनुपम सौंदर्य, संस्कृति, आध्यात्मिकता, लोक परंपराओं की मधुरता, देवभूमि की पवित्रता जीवन को विशेष अर्थ प्रदान करती है।
प्रश्न: उत्तराखंड के प्राकृतिक परिवेश और इसकी सुरम्यता का आपके मानस पटल पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ा?
उत्तर: उत्तराखंड के सुंदर, रमणीक पौड़ी जिले में मेरा जन्म हुआ। मैं सौभागशाली हूं। यहां की शांत वादियाँ, हरियाली, हिमालय की ऊंची चोटियां मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण रही हैं मैने अपनी प्रारंभिक शिक्षा, उच्च शिक्षा यहीं से प्राप्त की। अपने जन्मस्थान उसकी सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक विरासत पर मुझे गर्व है, जिसने मुझे ज्ञान, संस्कार और जीवन मूल्यों को गहराई से तराशा, सँवारा है।
प्रश्न: आपके पति आर्डिनेंस फैक्ट्री के अधिकारी रहे हैं?
उत्तर : जी, मेरे पति ऑर्डिनेंस फैक्ट्री से रिटायर्ड अधिकारी हैं। उनका संपूर्ण सेवाकाल देहरादून में ही पूर्ण हुआ है।
मैं उत्तराखंड के कई अलग अलग स्थानों में शिक्षण करती रही हूं। जो मेरे लिए बहुत सुखद, स्मरणीय रहा।
प्रश्न: हिंदी के साथ आपने सदैव किस प्रकार के रिश्ते को महसूस किया?
उत्तर: हिंदी हमारी मातृभाषा के साथ साथ हमारे भारत देश की सांस्कृतिक, साहित्यिक विरासत की वाहक भी है। अर्थशास्त्र विषय के साथ हिंदी विषय भी मेरा प्रिय विषय रहा है। अपनी भाषा में विचारों को सहज और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने की क्षमता भी हिंदी के प्रति मेरी रुचि का प्रमुख कारण भी रहा है।
प्रश्न : क्या अध्यापन का काम आपने विश्वविद्यालय में शिक्षा समाप्ति के काफी साल बाद शुरू किया?
उत्तर: ऐसा नहीं है, मैंने शिक्षा पूर्ण करते ही शिक्षण कार्य आरम्भ कर दिया था। 1985 में एम. ए .करने के साथ ही इसी वर्ष मैंने सरकारी विद्यालय (उत्तरकाशी) में शिक्षण कार्य शुरू कर दिया था। इसके बाद बहुत कम समय मैं वहां रही। तबादले के फलस्वरूप मैं एक वर्ष में ही अपने गृहजनपद पौड़ी के निकटवर्ती गांव के स्कूल में आ गई, जो पंद्रह किलोमीटर दूरी पर था। दो वर्ष वहीं रही। फिर पौड़ी के बालिका इंटर कॉलेज में मेरा तबादला हो गया, ये वही स्कूल था जहां से मैंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूर्ण की थी, ये मेरे लिए अद्भुत समय था, मेरी बहुत सी अध्यापिकाएं तब भी कार्यरत थीं, जिनसे शिक्षणकार्य में बहुत कुछ फिर से सीखने का अवसर मिला। 1990 में पदोन्नति के फलस्वरूप नरेन्द्रनगर टिहरी जिले के बालिका इंटर कॉलेज में पदभार ग्रहण किया ।वैवाहिक बंधन में बंधने के बाद सभी को ससुराल आना होता है, मेरा भी नरेंद्रनगर से कुछ समय बाद देहरादून आना हुआ। पच्चीस वर्ष तक मैंने देहरादून में अपनी सेवाएं दी। 2017 में मैंने प्रिंसिपल के पद पर पदोन्नति प्राप्त कर देहरादून के डोईवाला ब्लॉक में पदभार संभाला। वहीं से सेवानिवृत्त हुई।
प्रश्न: स्कूल अध्यापन में शिक्षार्थियों के लिए किस प्रकार की पाठ्येतर गतिविधियों को आप जरूरी समझती हैं?
उत्तर : आज के समय में विद्यालयों में पाठ्येतर गतिविधियां अत्यंत महत्व पूर्ण हो गई हैं। हमारे समय में ऐसा नहीं था शिक्षण कार्य पर अधिक जोर दिया जाता था।
विद्यार्थियों के लिए आज के संदर्भ में ये गतिविधियाँ उनके सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी हैं। उनके व्यक्तित्व को निखारती हैं। विद्यार्थी अपनी प्रतिभा को पहचाने और उसे विकसित करने के अवसर प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा एक सफल, जिम्मेदार, आत्मविश्वासी बनने में योगदान देती है। खेलकूद, वाद विवाद प्रतियोगिता, भाषण, संगीत, चित्रकला, विज्ञान प्रदर्शनी, नाट्यकला, कविता लेखन, सांस्कृतिक कार्यक्रम उनकी प्रतिभा को निखारती है। अब तो योग के कार्यक्रम भी विद्यालयों में चलाये जा रहे हैं जो बहुत महत्वपूर्ण हैं हमारे बच्चों के लिए। रोजगार के अवसर की जानकारी विद्यार्थियों को शिक्षण कार्य में ही मिल जाती है
बालिका विद्यालयों में त्योहारों के अवसरों पर मेंहदी प्रतियोगिता, केशसज्जा जैसी प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं।
प्रश्न: उत्तराखंड में अभी भी लोगों के जीवन में पिछड़ापन विद्यमान है?
उत्तर : उत्तराखंड को पिछड़ा राज्य कहना उचित नहीं होगा। यहां साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से बेहतर रही है। हालांकि पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार संबंधी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इसके बावजूद राज्य सरकार और स्थानीय समुदाय शिक्षा के विकास में निरंतर प्रयासरत है।
प्रश्न: अपने देश में किन- किन राज्यों की यात्रा करने का मौका मिला है?
उत्तर: उत्तराखंड के अतिरिक्त अन्य कई राज्यों में शिक्षण के दौरान व साहित्यिक सम्मेलनों के लिए जाने का अवसर मुझे कई बार मिला है। कश्मीर, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, असम, गुजरात, गोवा, पंजाब ,उत्तर प्रदेश आदि के दर्शनीय स्थानों को देखने के अवसर मुझे मिले हैं। “अपने उत्तराखंड सा सुकून कहीं नहीं ”
प्रश्न: अपनी प्रिय पुस्तकों और अन्य प्रकार के पठित साहित्य के बारे बताएं।
उत्तर: गीता, श्रीरामचरितमानस, सबसे अधिक मैंने कालिदास को पढ़ा है जिसमें कुमारसंभवम, विक्रमोवरशीयम, अभिज्ञान शकुंतलम, रघुवंशम्, मेघदूतम् आदि हैं । इनके अतिरिक्त मोहन राकेश, विष्णु प्रभाकर, निर्मल वर्मा, फणीश्वरनाथ रेणु, हिमांशु जोशी की कहानियां मैंने पढ़ी हैं। सोफी का संसार पाश्चात्य जगत की दर्शन गाथा, मैत्रेयी पुष्पा की कहानियां, इतने अच्छे दिन, कमलेश्वर, ज़िंदगी कोई सौदा नहीं इंदिरा गोस्वामी, मैं कौन हूं मनोहर श्याम जोशी, मल्लिका समग्र डॉ राजकुमार, तीन समंदर पार राजीव शुक्ला, कीर्तिज्ञान चंदन पांडे, वैशाली की नगरवधू आचार्य चतुरसेन, सत्य के प्रयोग मोहनदास करमचंद गांधी, दीवार पर एक खिड़की रहती थी विनोद कुमार शुक्ल के अलावा मंटो व अमृता प्रीतम को भी पढ़ा है । सोफी का संसार ( हिंदी रूपांतरण) आदि ने मुझे प्रभावित किया है।
गीता भारतीय संस्कृति और दर्शन का अमूल्य ग्रंथ है। यह मनुष्य को कर्म, कर्तव्य, नैतिकता आत्मज्ञान का मार्ग दिखाती है। सोफी का संसार उपन्यास के रूप में दर्शनशास्त्र का सरल और रोचक परिचय कराती है। पाठक को सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, कांट जैसे दार्शनिकों के विचारों से परिचित कराती है। कालिदास की लेखनी की सबसे अद्भुत क्षमता प्रकृति चित्रण, भावों की गहनता, सौंदर्यपूर्ण अभिव्यक्ति है। जिसने मुझे लिखने की प्रेरणा दी। उनका साहित्य मानवीयता का संदेश हमें देता है।



