हिंदी में हेमचंद्र सकलानी पर्यटन साहित्य लेखन के लिए प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में इनके स्वास्थ्य की दशा ठीक नहीं है लेकिन इसके बावजूद इनका लेखन अनवरत जारी है। यहां प्रस्तुत है राजीव कुमार झा से इनकी सहज बातचीत!
साहित्य: साक्षात्कार
प्रश्न – पिछले दिनों आपके अस्वस्थ रहने के बारे में जानकारी मिली। अब आजकल स्वास्थ्य कैसा है?
उत्तर – उम्र के साथ स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां आती रहती हैं पर मैंने अपने आप को हमेशा इतना व्यस्त रखा है कि मुझे दर्द पीड़ा कमजोरी और रोग का अधिक एहसास नहीं होता। कुछ महीने पहले बुखार गले की एलर्जी के समय दस बारह दिन आवाज ही बंद हो गयी थी। दस पंद्रह दिन बिस्तर में लेटे रहे। घूमते फिरते रहने वाले के लिए कितना कष्टदायी समय रहा होगा। पर सत्य यही है मित्रों से मिलने जुलने हंसने बोलने से लेखन में सक्रिय रहने से, साहित्यिक कार्यक्रमों सक्रिय रहने से बहुत आराम का और शांति का अहसास होता रहता है।
प्रश्न – आपने कविता लेखन ज्यादा नहीं किया लेकिन आपने जो भी कविताएं लिखीं उसकी सराहना हुई। कविताओं से आप किस तरह का लगाव महसूस करते हैं?अपने कविता लेखन के बारे में बताइए।
उत्तर – जब पांचवीं में पढ़ता था तब एक दिन माँ ने मुझे बहुत मारा। मैं रोते हुए दूसरे कमरे जाकर बिस्तर पर किताब कापी रखी। तब माँ पर बहुत गुस्सा आया और कापी पर माँ के ऊपर गुस्से में एक कविता लिखते सो गया। जब माँ सोते देख कापी बंद करनी चाही तब कविता पर नजर पड़ी। फिर जब कोई घर आता माँ उन्हें वह कविता सुनाती तब सब बहुत जोर जोर से हंसते थे। तब मुझे माँ पर बहुत गुस्सा आता था कि माँ मेरा मजाक उड़ा रही है। बहुत बाद में मुझे किसी ने बताया मजाक नही उड़ा रही थी तुम्हारी कविता की तारीफ कर रही थी तभी तो उसने कविता याद रखी और फिर औरों को सुनाती है।
लगभग दो सौ कविताएँ लिखी, अधिकांश प्रकाशित हुई।1.शब्दों के पंछी/2.कविताएँ कुछ कहती हैं/देशभक्ति की कविताओं का संग्रह (पुस्तकें) 3.”लहराए तिरंगा” शीर्षक से प्रकाशित हुई। सारेगामापा की विजेता ईशिता विश्वकर्मा ने इनमें दस को स्वरबद्ध कर जिसकी सीडी जारी की। तथा डूबती टिहरी की कविताओं का संपादन किया। कविता लिखी नहीं जाती वेदन संवेदना स्पर्श से स्वत ही जन्म लेती है। आज सोशल मीडिया पर या अन्य लोग कहते हैं इस पर लिखो उस पर लिखो फिर लेखक मेज पर बैठ कर शब्दों को जोड़ तोड़ कर रचना लिखता है। पर उस रचना में स्पर्श की क्षमता प्रभावित करने की छमता मंत्रमुग्ध करने की क्षमता नहीं होती। क्योंकि वेदना संवेदना स्पर्श ही कविता को जन्म देते हैं।
एक घटना का जिक्र करना चाहता हूँ। कुछ वर्षों पहले मुझे एक साहित्य सम्मेलन में एक हफ्ते के लिए मुंबई जाना पड़ा। इस हफ्ते के दौरान अनेक पर्वतीय क्षेत्र के लोगों से मुलाकात हुई, जो पहाड़ अपने गांव को छोड़कर मुंबई में बस गए थे। तब सब मुझसे अपने गांव के अपने शहर की,अपनी नदियों की अपने झरनों की, अपने खेतों की और रिश्तेदारों के बारे में निरंतर मुझसे पूछते रहे। मैं भी आश्चर्य चकित था कि यह लोग अपने घर बार छोड़कर यहां आ गए हैं लेकिन अपने गांव के प्रति पर्वतीय क्षेत्र की प्रकृति,अपने लोगों के प्रति इन लोगों का मोह अभी भी कायम है। तो उस रात सोचते सोचते मेरे दिमाग में एक कविता ने जन्म लिया जिसकी शुरू की दो पंक्तियां थीं “मेरे दोस्त तू आया है मेरे पहाड़ से तो कुछ और नहीं मेरे पहाड़ की बात कर, नदी की तलहटी या शिखर पर बसे किसी गांव की बात कर।” इस कविता पर जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला और प्रसिद्ध अभिनेता हेमंत पांडे जी ने मुझे अपने विशेष कार्यक्रम में बुलाया। कुछ समय बाद देहरादून में एक कवि सम्मेलन हुआ तो उस कवि सम्मेलन में जब यही कविता पढ़कर जब मैं स्टेज से उतरा तो सामने कुर्सी पर बैठे एक बुजुर्ग से सज्जन अपनी कुर्सी से उठे और मुझे एकदम गले से लगा लिया और बोले बहुत अच्छी कविता बहुत अच्छी कविता। मुझे आश्चर्य हुआ आज तक ऐसा नहीं हुआ था। यह कौन सज्जन हैं जब मैंने वहां लोगों से पूछा तब उन्होंने बताया यह प्रसिद्ध हास्य कवि हुल्लड़ मुरादाबादी हैं तब मेरी हंसी खुशी और आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। बाद में एक बड़ी पत्रिका के संपादक ने मुझसे पांच कविताएं मांगी कि आपकी एक रचना हमें प्रकाशित करनी है तो चार के बाद सबसे आखिर में मैंने यही कविता रखी थी कि शायद यह पसंद न आये। पर तब मुझे आश्चर्य हुआ कि संपादक ने शुरू की चारों रचनाएँ छोड़ दी थीं और यही रचना प्रकाशित की थी।
प्रश्न – क्या अब भी आप देहरादून में ही रहते हैं? अपने बचपन माता – पिता शिक्षा दीक्षा इन सबके बारे में बताइए?
उत्तर – जी ,बचपन इलाहाबाद में फिर युवावस्था और पढ़ाई हाईस्कूल,इंटर किया। बी .ए. और राजनीति शास्त्र/इतिहास में डबल एम.ए.आगरा यूनिवर्सिटी से किया। मेरे इंटर का रिजल्ट निकला ही था कि पिताजी का स्वर्गवास हो गया,लगभग 2 वर्षों से बीमार थे। छ लोगों का परिवार था। तब मुझे छोटी सी नौकरी करनी पड़ी। और हमारा कॉलेज शहर में हमारे प्रोजेक्ट से लगभग 20 किलोमीटर दूर था। कॉलेज से आने के बाद रात में पावर हाउस में ड्यूटी करने जाता था। पहली रचना में सन 1965 में मेरी नवभारत के बाल पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी तो खुशी से उछलते कूदते जब पिताजी को जब दिखाने के लिए गया तो उनका एक थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ा था यह कहते हुए कि पढ़ने लिखने के बजाय यह काम कर रहे हो तुम। पर माँ देखकर खुश हुई थी।
प्रश्न – हमारी सभ्यता और संस्कृति में पर्यटन का क्या महत्व रहा है? अपने पर्यटन के अनुभवों के आधार पर इसके बारे में क्या कहना चाहेंगे?
उत्तर – जानने की उत्सुकता और ज्ञान अर्जन की भावना ही हमें यात्रा पर ले जाती है और जब उन स्थानों का अध्ययन करते हैं तब उनके कालखंड को, इतिहास, संस्कृति,और सभ्यताओं को हम जान पाते हैं। यदि पूर्व में प्रसिद्ध लेखकों ने अपने यात्रा वृत्तांत न लिखे होते तो आज के लोग कैसे उस काल की सभ्यता संस्कृति इतिहास के बारे में जान पाते।
अपनी यात्राओं में मैंने 16 देश के 18 शहरों की और आपने देश की कश्मीर से कन्या कुमारी-कच्छ रण से अरुणाचल तक की यात्रा की। और यात्राओं से बहुत अच्छे अनुभव हुए। यही नहीं वहां के इतिहास, पुरातात्विक,ऐतिहासिक इमारतों की ही नहीं वहां घटित विशेष घटनाओं वहां की संस्कृति,लोगों के आचरण, परंपराओं,जीवन यापन,रीति रिवाजों का बहुत कुछ अध्ययन करने की कोशिश की और उन्हें लिपिबद्ध किया उनके सात यात्रा वृत्तांत पुस्तकें प्रकाशित कीं जिससे लोग वहां के बारे में जान पाएं। सारे यात्रा वृत्तांत विभिन्न पत्र पत्रिकाओं ने प्रकाशित किया। भारत सरकार का प्रथम पुरस्कार मिला। तथा प्रणाम पर्यटन का प्रथम पुरस्कार मिला। यह जरूर है कि यात्राओं पर बहुत खर्च करना पड़ता है शारीरिक और मानसिक, यांत्रिक परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। बहुत अध्ययन करना पड़ता है कहीं गलत तो नहीं लिखा।
दुनिया के अनेक देशों में पर्यटन को आज अपना मुख्य आर्थिक अर्जन का आधार बनाया। उन्होंने अपने पर्यटक स्थलों को बहुत सुंदर रूप प्रदान किया,जिसके कारण वहां पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। जबकि हमें हमारे यहां इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया।
प्रश्न – पर्यटन का काफी विकास सरकार ने किया है लेकिन इसमें काफी बदलाव भी आया है।
इस क्षेत्र में हमारे देश में वर्तमान में क्या बदलाव दिखाई देता है?
उत्तर – यह जरूर है , सड़कों के क्षेत्र में पर्यटन के क्षेत्र में विकास हुआ,पर वहाँ पर स्टे करने काफी धन खर्च करना पड़ता है। इसमें धन कमाना मुख्य उद्देश्य है,पर्यटकों को सुविधा मिले इसकी दृष्टि से कुछ नहीं हुआ। पर्यटकों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कुछ लोगों के लिए तो सब मुफ्त है पर कुछ लोगों के लिए बहुत खर्चीला भी है। हमारी आबादी बहुत विशाल है अतः पर्यटन स्थलों को और अधिक सुंदर स्वरूप देकर पर्यटकों को सुविधाएं उपलब्ध कराकर लाभ उठाया जा सकता है।




